बुधवार, 30 अगस्त 2023

बनारस

इस शहर में बसंत 
अचानक आता है 

और जब आता है मैंने देखा है 
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से 
उठता है धूल का एक बवंडर 
और इस महान पुराने शहर की जीभ 
किरकिराने लगती है 
जो है वह सुगबुगाता है 
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेध पर जाता है 
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर 
कुछ और मुलायम हो गया है 

सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आखों में 
एक अजीब-सी नमी है 
और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है 
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन 
तुमने कभी देखा है 
खाली कटोरों में बसंत का उतरना! 

यह शहर इसी तरह खुलता है 
इसी तरह भरता है 
और खाली होता है यह शहर 
इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव 
ले आते हैं कँधे 
अँधेरी गली से 
चमकती हुई गंगा की तरफ़ 

इस शहर में धूल 
धीरे-धीरे उड़ती है 
धीरे-धीरे चलते हैं लोग 
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे 
शाम धीरे-धीरे होती है 
यह धीरे-धीरे होना 
धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय 
दृढ़ता से बाँधे हैं समूचे शहर को 
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है 
कि हिलता नहीं है कुछ भी 
कि जो चीज़ जहाँ थी 
वहीं पर रखी है 
कि गंगा वहीं है 
कि वहीं पर बँधी है नाव 
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकडों बरस से 
कभी सई- सांझ 
बिना किसी सूचना के 
घुस आओ इस शहर में 
कभी आरती के आलोक में 
इसे अचानक देखो 
अद्भुत है इसकी बनावट 
यह आधा जल में है 
आधा मंत्र में 
आधा फूल में है 
आधा शव में 
आधा नींद में है 
आधा शंख में 

अगर ध्यान से देखो 
तो यह आधा है 
और आधा नहीं है 
जो है वह खड़ा है 
बिना किसी स्तंभ के 
जो नहीं है उसे थामे है 
राख और रौशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ 
आग के स्तंभ 
और पानी के स्तंभ 
धुँए के 
ख़ुशबू के 
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ 
किसी अलक्षित सूर्य को 
देता हुआ अर्घ्य 
शताब्दियों से इसी तरह 
गंगा के जल में 

अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर 
अपनी दूसरी टांग से
 बिलकुल बेखबर!

- केदारनाथ सिंह।
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अनूप श्रीवास्तव की पसंद 

मंगलवार, 29 अगस्त 2023

ज़िंदगी और मौत

मौत ने ज़िंदगी से कहा
मैं तुमसे ज़्यादा ताकतवर हूँ
क्योंकि तुम्हें एक दिन मेरी ही शरण में आना है!

ज़िंदगी ने उत्तर दिया,
मैं हूँ तो
फूल है, पत्ती है, बच्चे हैं, रंग-बिरंगी चिड़ियाँ है और प्रेम है!
मैं हूँ तो धरती आबाद है!

अब मौत की बारी थी
जिनकी तुम बातें कर रही हो
उनकी कितनी बार मैं क़ब्र बिछा चुका हूँ
इसलिए मैं ही ताक़तवर हूँ!

ज़िंदगी ने तर्क आगे बढ़ाया
मैं हूँ तो तमाम सभ्यताएँ फली-फूली
इंसानियत ने बड़े बड़े डग भरे!

इस बार मौत ने बहुत डरावने अंदाज़ में कहा
तुम्हें यह भी पता होना चाहिए
कि कितनी सभ्यताओं को मैंने धूल में मिला दिया!
आज तुम उनके अवशेष ढूँढ़ते फिर रहे हो!

इस बार ज़िंदगी ने मुस्कुरा कर कहा
मैं ही तो हूँ
जो दोनों तरफ़ से तर्क कर रही हूँ
तुम्हारा तो कोई पक्ष ही नहीं
तुम तो मौत हो
सिर्फ़ ठंडी मौत!!

- मनीष आज़ाद।

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प्रगति टिपणीस की पसंद

राजेंद्र गुप्ता के सौजन्य से 

सोमवार, 28 अगस्त 2023

पान का गीत

छप्पर-छानी सजी हुई है
परवल पान रतालू की बारी में भीगी
वर्षा ऋतु की गमक अभी तक बसी हुई है

चैत गया बैसाख आ गया
महुआ चूने लगा
लपट लू की झुलसाने लगी
तवे-सी तपती धरती लेकिन फिर भी
पनवारी की बारी में
हरियाली की ऐसी रंगत है ऐसी धज है...

जैसे कोई नया-नवेला
बप्पा से आँखें बरका कर
पान दबा कर चोरी-चोरी
पनवारी के दर्पन में
अपनी मुखशोभा देख रहा हो
और भीगती हुई रेख का दर्प
दीप्त कर दे दर्पन को!

हरियाली के भीतर-भीतर उठती गिरती
एक लहर उससे भी गहरी हरियाली की!

दिनेश कुमार शुक्ल।

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संपादकीय पसंद 

रविवार, 27 अगस्त 2023

माँ पर नहीं लिख सकता कविता

माँ के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिउँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चंद्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

चंद्रकांत देवताले।

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संपादकीय पसंद 

शनिवार, 26 अगस्त 2023

वे इस पृथ्वी पर

वे इस पृथ्वी पर
कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं ज़रूर
जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर
कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं
बचाए हुए हैं उसे
अपने ही नरक में डूबने से
वे लोग हैं और बेहद नामालूम घरों में रहते हैं
इतने नामालूम कि कोई उनका पता
ठीक-ठीक बता नहीं सकता
उनके अपने नाम हैं लेकिन वे
इतने साधारण और इतने आमफहम हैं
कि किसी को उनके नाम
सही-सही याद नहीं रहते
उनके अपने चेहरे हैं लेकिन वे
एक दूसरे में इतने घुले-मिले रहते हैं
कि कोई उन्हें देखते ही पहचान नहीं पाता
वे हैं, और इसी पृथ्वी पर हैं
और यह पृथ्वी उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है
और सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि उन्हें
रत्ती भर यह अंदेशा नहीं
कि उन्हीं की पीठ पर
टिकी हुई यह पृथ्वी।

- भगवत रावत।

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कुमार अनुपम द्वारा प्रेषित

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

नवगीत

गोद लिये वह दो बच्चों को
भीड़ भरे कच्चे मसान में
देख रही है धूँ-धूँ जलती 
घरवालों की तीन चिताएँ

छोटे छप्पर में छह जन थे 
सास ससुर पति के बंधन थे 
साँझ-सवेरे नित टकराते
रीते-बीते-से बर्तन थे 
छप्पर बेचा, बर्तन बेचे 
फिर भी कम पड़ गईं दवाएँ

बच्चे-बूढ़ों-से सारे दुख 
देखे-भाले-दुलराए थे 
भूख-ग़रीबी-रोग-उधारी
घर के थे, आते जाते थे
वज्रपात के बाद मगर थे
यम के साए दाएँ-बाएँ

ले आई सिंदूर की रेखा
घर से जिसको इस मसान तक 
ले जाएगी ममता उसको
इस मसान से किस मसान तक 
जाने क्या-क्या जल जाना है 
हल क्या है कुछ आप सुझाएँ

- विजय कुमार स्वर्णकार।

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लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की पसंद

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

अबकी बार लौटा तो

अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूँगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बाँधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूँगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा
घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह-बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं
अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूँगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा

- कुँवर नारायण।

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अनूप भार्गव की पसंद

बुधवार, 23 अगस्त 2023

कौन जात हो भाई?

कौन जात हो भाई?
'दलित हैं साब!'
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गंदी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
मुझे लगा हिंदू में आते हो!
आता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में

क्या खाते हो भाई?
'जो एक दलित खाता है साब!'
नहीं मतलब क्या-क्या खाते हो?
आपसे मार खाता हूँ
कर्ज़ का भार खाता हूँ
और तंगी में नून तो कभी अचार खाता हूँ साब!
नहीं मुझे लगा कि मुर्गा खाते हो!
खाता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में

क्या पीते हो भाई?
'जो एक दलित पीता है साब!'
नहीं मतलब क्या-क्या पीते हो?
छुआ-छूत का गम
टूटे अरमानों का दम
और नंगी आँखों से देखा गया सारा भरम साब!
मुझे लगा शराब पीते हो!
पीता हूँ न साब! पर आपके चुनाव में

क्या मिला है भाई?
'जो दलितों को मिलता है साब!'
नहीं मतलब क्या-क्या मिला है?
ज़िल्लत भरी जिंदगी
आपकी छोड़ी हुई गंदगी
और तिस पर भी आप जैसे परजीवियों की बंदगी साब!
मुझे लगा वादे मिले हैं!
मिलते हैं न साब! पर आपके चुनाव में

क्या किया है भाई?
'जो दलित करता है साब!'
नहीं मतलब क्या-क्या किया है?
सौ दिन तालाब में काम किया
पसीने से तर सुबह को शाम किया
और आते-जाते ठाकुरों को सलाम किया साब!
मुझे लगा कोई बड़ा काम किया!
किया है न साब! आपके चुनाव का प्रचार…

बच्चा लाल 'उन्मेष'।

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विजय नगरकर की पसंद

मंगलवार, 22 अगस्त 2023

अनकही

वह कहता था 
वह सुनती थी
जारी था एक खेल
कहने सुनने का 
खेल में थी दो पर्चियाँ
एक में लिखा था ‘कहो’
एक में लिखा था ‘सुनो’ 
अब यह नियति थी 
या महज़ संयोग
उसके हाथ लगती रही 
वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’
वह सुनती रही 
उसने सुने आदेश
उसने सुने उपदेश
बन्दिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थीं वर्जनाएँ 
वह जानती थी
कहना सुनना नहीं हैं 
केवल हिंदी की क्रियाएँ
राजा ने कहा ज़हर पियो
वह मीरा हो गई
ऋषि ने कहा पत्थर बनो
वह अहिल्या हो गई 
प्रभु ने कहा 
घर से निकल जाओ 
वह सीता हो गई 
चिता से निकली चीख 
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी 
वह सती हो गई 
घुटती रही उसकी फरियाद
अटके रहे उसके शब्द
सिले रहे उसके होंठ
रुँधा रहा उसका गला 
उसके हाथ कभी नहीं लगी
वह पर्ची
जिस पर लिखा था - 'कहो'

- शरद कोकास।
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अनुभूति काबरा की पसंद 

सोमवार, 21 अगस्त 2023

साइकिल

बूढ़े के साथ बूढ़ी 
और 
जवान के साथ जवान 
साइकिल की नींद में हैं 
तीन चीज़ 
सड़क 
पैर 
हवा।

सड़क की नींद में जूते 
पैर की नींद में घास 
हवा की नींद में पत्तियाँ 
साइकिल किसी की नींद में नहीं।

जैसे कि 
हमारे घर में अकेली साइकिल 
और साइकिल के घर में 
हम-सब। 
अम्मा, बुआ और भाई-बहन 
कुल मिलाकर नौ 
एक साथ सबको ख़ुश नहीं कर पाती।

सिर्फ़ घंटी बजने जितनी मोहलत माँगने 
मेहराबदार रास्तों में 
बार-बार भटकी 
इतनी-इतनी चढ़ाइयाँ 
कि सड़क ढली 
हवा रुकी 
पैर थके 
साइकिल नहीं थकी।

जब तक वह घर में है 
बापू की यादगार है।

- शरद बिलौरे।

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प्रगति टिपणीस की पसंद

शनिवार, 19 अगस्त 2023

देह की गोलाईयों तक आ गये

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये
थे कभी मुखपृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये

यवनिका बदली कि सारा दृश्य बदला मंच का
थे कभी दुल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये

वक्त का पहिया किसे कुचले कहाँ कब क्या पता
थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं
जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये

देश के संदर्भ में तुम बोल लेते खूब हो
बात ध्वज की थी चलाई कुर्सियों तक आ गये

प्रेम के आख्यान में तुम आत्मा से थे चले
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये

कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को
तुम ऋचाएँ मानते थे गालियों तक आ गये

सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा
देवताओं से शुरु की वहशियों तक आ गये

- चंद्रसेन विराट।

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अनूप भार्गव की पसंद 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

साँसों की अदम्य ताकत है - होगा

शिराओं में हर पल बहता हुआ
अबाध उम्मीद का दीया,
अद्भुत, जादुई भरोसा
जो कभी पूरा नहीं हुआ
कभी मिटता भी नहीं।

काट लेते हैं सारी उम्र
हारते, पछाड़ खाते "होगा" के भरोसे
सार्थक बनने की बची हुई प्यास
पराजय की राख के नीचे
चिनकती चिंगारी जैसी अनबुझी।

साँसों की अदम्य ताकत है - होगा

कल्पना का स्वप्निल क्षितिज
मनचाहे जीवन का अनगढ़ मैदान
आत्मा की शिराओं में बहती
अनजानी प्रेरणा की तरह।

"होगा" मचलती हुई मशाल है,
ऊँचाईयों की उठान
रोम-रोम से पुकारो!
अपना शेष रह गया "होना"
मिलेगा पूर्णता का असंभव शिखर।

टिका हुआ है - होगा

है की जमीन पर।
है - रीढ़ जैसा है - होगा के लिए
वर्तमान की धड़कनें
टिकी रहती हैं अक्सर - होगा पर।

"जैसा चाहा, वैसा हुआ"
ऐसा आजतक कहाँ हुआ?
मगर चाहने से मुक्ति पाना
किसके लिए संभव हुआ?

- भरत प्रसाद।
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प्रगति टिपणीस की पसंद 

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

खजुराहो में मूर्तियों के पयोधर

पत्थरों में कचनार के फूल खिले हैं 
इनकी तरफ़ देखते ही आँखों में
रंग छा जाते हैं
मानो ये चंचल नैन
इन्हें जनमों से जानते थे।

मानो हृदय ही फूला-फला है
अपनी सारी उदारता के साथ
काया के ऊपर
डाल पर पके बेल की आभा और गंध लेकर

एक मद्धम सुनहरी आँच
फूटती है इनके चतुर्दिक
जैसे भोर के सुरमई संसार में
दिन निकलने से ठीक पहले
दिखता है लालटेन का प्रकाश वृत।

सम्मोहन से सुचिक्कन ये कांति के कोहिनूर
दीप रहे हैं हज़ार वर्षों से
ताम्बई दीपाधारों पर फूट पड़ने को तत्पर
प्रथम सद्यः प्रसूता के स्तनों जैसे
उन्नत-उज्ज्वल और वर्तुल।

मनुष्य का सबसे मुलायम अनुभव
छेनी और हथौड़ियों से तराशा गया है
जैसे बलखाती नदी का जल
हौले-हौले गढ़ता है शालिग्राम
कलेजे से लगाकर शिलाखंड।

कलाकार हाथों ने पत्थरों में जड़ दिए हैं
नवनीत के बड़े-बड़े लोने
कि वे सदा वैसे ही बने रहें
न ढलें, न गलें
प्रगाढ़ आलिंगनों से अक्षत
इतने उदग्र ऐसे उद्धत
जैसे संसार भर में बनने वाली रंग-बिरंगी चोलियाँ
पाँव पोंछने के लिए हों।

इन्हें देखकर मन करता है
कहीं से कटोरा-भर केसर घोल लाऊँ
और धीरे-धीरे करूँ इन पर लेप
जैसे ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया जाता है
मनुहार कर किसी को ले चलूँ अपने संग
खूब आदर-सत्कार करूँ और पूछूँ
इन मंगलघटों में बसे
मनुष्य के प्राणों का रहस्य।

जिन दिनों आधी-आधी रात तक
चलती है पुरवाई
अमराइयों में अलसाई कोयल
बोलती है कुहु-कुहु
नारंगी का यह मदन-रस-माता बाग
अपनी आती-जाती हर सांस के साथ डोलता है।

मौसम की पहली बारिश के बाद
तत्क्षण जब निकलती है धूप
घटा और घाम में एक साथ नहाए
वक्षों से उठते हैं वाष्प के फाहे
माघ की सुबह मुँह से निकली भाप की तरह
जैसे किसी सद्यः स्नाता की देह से
उठती हो निशब्द कामनाओं की लौ।

एक सखी दूसरी से कहती है
सखी! अपने ये फूल देख रही हो
नंदन वन का पारिजात भी
इनके आगे कुछ नहीं है
जब तुम कुएं में पानी भरने जाओगी
तो धरती के ये फूल गेंदें 
पाताल तक महकेंगे।

इस पर्वत उपत्यका में कभी
मृगछौने के पीछे दौड़कर देखो
ललछौंही आँखों वाले ये खरगोश
अपनी जगह उछल-कूद की
कैसी प्रीतिकर युगलबंदी करते हैं।

सजते सँवरते समय ये किसी व्याकुल छैला की तरह
उचक-उचककर आईने में झाँकते हैं
तब मन करता है प्रिय की पठायी मुंदरी की तरह
इन्हें हाथ में लेकर हियरा भर देखूँ।

गोमुख से निकली गंगा की तरह
कंचनजंघा के इन सुनहरे शिखरों से भी
फूटती है एक गंगोत्री जिससे यह सारी धरती
दूधो नहा और पूतों फल रही है।

- दिनेश कुशवाह।
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कुमार अनुपम की पसंद

बुधवार, 16 अगस्त 2023

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

तुम्हारी निश्चल आँखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लंबी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा
पर बच्चों के फूलों वाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना 
मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से 
परे है तुम्हारी परछाई

- चंद्रकांत देवताले।
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कुमार अनुपम की पसंद

मंगलवार, 15 अगस्त 2023

शिशु

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है,
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है।

समझता है सबकी भाषा
सभी के अल्ले ले ले ले,
तुम्हारे वेद पुराण कुरान
अभी वह व्यर्थ समझता है।
अभी वह अर्थ समझता है।

समझने में उसको, तुम हो
कितने असमर्थ, समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
उसी से है, जो है आशा।

- नरेश सक्सेना।
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संपादकीय पसंद

सोमवार, 14 अगस्त 2023

कोसल में विचारों की कमी है


महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो!
युद्ध नहीं हुआ -
लौट गए शत्रु।
वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी।
कोई कसर न थी।
युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता।
न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व
न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था!
निहत्थे थे वे।
उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है!
जो भी हो
जय यह आपकी है।
बधाई हो!
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए -
वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं
जैसे कि यह -
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है।
- श्रीकांत वर्मा
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कुमार अनुपम की पसंद 

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

उस उस राही को धन्यवाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लंबी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं 

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलंबित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अंतर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

- शिवमंगल सिंह 'सुमन'।

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विज्ञान व्रत की पसंद

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ ख़ुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास

चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?
तुम्हें मेरी याद तो न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्हीं-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?

चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?
उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है
इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्हीं पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है
फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को क़िताबों को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है
चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

- ज्ञानेंद्रपति
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संपादकीय चयन।

बुधवार, 9 अगस्त 2023

हवा-बतास

अम्माँ अक्सर डपट लेती
क्या दनही घोड़ी के लेखे हिनहनाती रहती हो हरदम 
एक तुमहीं लड़की हो इस दुनिया में
या कि तुमसे पहले कोई लड़की थोड़े ही हुई है
और फिर हँसते-हँसते रुआँसी हो जातीं घर की लड़कियाँ
अम्माँ कहती लड़कियाँ हँसती हैं तो हवा -बतास लग जाती है 
जाने वो कौन-सी हवा थी जो,
हदस बनकर अम्माँ के मन में ऐसे बैठी
कि जेठ-बैसाख की निचाट दुपहरिया
अम्माँ मोहारे बँसोला बिछाए निखरहर पड़ी रहती 
वो हौव्वारा बहता कि चमड़ी झौंस उठती 
करवट बदलती तो मूँज की छकड़ी डिजाइन 
अम्माँ की नंगी पीठ पर छप जाती 
चाहे जितना भी अकाज हो
क्या मजाल कि कोई देहरी के बाहर गोड़ रख दे 
लाली, पाउडर, काजल की सख्त मनाही 
इधर लड़कियाँ होठ रंगती, उधर अम्माँ चीखती
होंठ रंगाय के रंडी बनोगी
ढिंगरा बेरावे जा रही लिप्सटिक पाउडर लगा के
और अगर गलती से भी 
दुआरे- पिछवाड़े कोई बिसाती दिख जाए, 
तो दूर तके निकारी लेखे सरहद डँका आती अम्माँ 
मेंहदी के बूटे से खोंटी हुई पत्तियाँ
रात भर भगोने में सपनों-सी भींजती
अम्माँ के अढ़वा डोलाती छुटकी मेल्हाते हुए पूछते 
ऐ दाई, एक हाथे मेंहदी हमहुँ रचाय लेई का ? 
अम्माँ उसकी मुँहजोरई पर गुस्सा हो कहती 
दाई के माई हो
हवा-बतास पिंड पकड़ लेई,
तौ सारी साध बिलाय जाई
और फिर कितने अरमानों को बदरंगा छोड़
सिल की देह ललाने के बाद
पूरा नाबदान रंगती बह निकलती मेंहदी 
जाने वो कौन-सी हवा थी
लग जाती तो
हँसती, खिलखिलाती गाँव की अल्हड़ लड़कियाँ
अगले ही पल अइँठ-बरर जाती 
देखते-देखत चली जाती अललै जान 
धरा रह जाता सब झाड़-फूँक
हवा का असर बता हाथ मल रह जाते 
ओझा, सोखा और वैद्य
बहुत देर हो गई कहकर मुँह फेर लेते डॉक्टर 
पीछे कुछ कनफुसिया उमगती, 
एक दिन, दो दिन 
कोई कहता मुँह से फेचकुर निकल रहा था 
कोई कहता सियाही हो गई थी समूची देह
कोई कहता फक्क सफेद होकर 
उलट गई थी आँख की गोट्टियाँ 
जो जो रही थी उसकी सखी-सहेली
उनको पहना दिए जाते ताबीज में
भालू के बाल, बंदर के दाँत, बाघ की खाल
ऐसी बहुत-सी हँसी मुझे याद है
वो तमाम हवा लगी लड़कियाँ 
मेरे सपनों में आ-आकर हँसती हैं 
गाल भर-भरकर हँसती हैं
आज भी वो हवा लग-लगा जाती है
मेरे गाँव की लड़कियाँ अब कोचिंग जाती हैं,
स्कूटी से स्कूल-कॉलेज जाती हैं
जींस पहनती हैं
मेंहदी, काजल, लिपस्टिक लगाती हैं
मेरे गाँव की लड़कियाँ कबड्डी और क्रिकेट खेलती हैं 
पर आज भी मेरे गाँव की अल्हड़ लड़कियाँ 
हँसती ठठाती अललै मर जाती हैं 
उन्हें आज भी लग जाती है हवा!

-सुशील मानव
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डॉ० जगदीश व्योम की पसंद।

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

बात सीधी थी पर

बात सीधी थी पर एक बार

भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई।

उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-

लेकिन इससे भाषा के साथ-साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्योंकि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह!

आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था -
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।

हारकर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।

ऊपर से ठीक-ठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देखकर पूछा -
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”

- कुँवर नारायण।

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अनूप भार्गव की पसंद।