छोड़ देगी किनारों को
नदी बहुत चुपके से
ख़ुद को समेट लेगा
भँवर तालों में
असोज आएगा
बहुत चुपके से
सारी नमी सोख जाएगा
बहुत मोहक ढंग से
फैलने लगेगा कुहरा
घाटियों के आर-पार
धरती चुपचाप रहेगी
अपने सीने में
अगली फ़सलों के लिए नमी बचाए
ज़रूरी नहीं हर बार जीता जाए
बेढप मौसमों को
उबलते जज़्बातों से
कभी-कभी बेढप समयों में
नमी को बचा ले जाना भी
गोया अपने भीतर
धरती बचाने जैसा है
- अनिल कार्की
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संपादकीय चयन