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बुधवार, 29 जनवरी 2025

अधूरे मन से ही सही

अधूरे मन से ही सही
मगर उसने
तुझसे मन की बात कही

पुराने दिनों के अपने
अधूरे सपने
तेरे क़दमों में
ला रखे उसने

तो तू भी सींच दे
उसके
तप्त शिर को
अपने आँसुओं से
डाल दे उस पर
अपने आँचल की
छाया
क्योंकि उसके थके-मांदे दिनों में भी
उसे चाहिए
एक मोह माया

मगर याद रखना पहले-जैसा
उद्दाम मोह
पहले-जैसी ममत्व भरी माया
उसके वश की
नहीं है
ज़्यादा जतन नहीं है ज़रूरी

बस उसे
इतना लगता रहे
कि उसके सुख-दुख को
समझने वाला
यहीं-कहीं है!

- भवानीप्रसाद मिश्र
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अनूप भार्गव की पसंद 

रविवार, 18 अगस्त 2024

चिकने लंबे केश

चिकने लंबे केश
काली चमकीली आँखें
खिलते हुए फूल के जैसा रंग शरीर का
फूलों ही जैसी सुगंध शरीर की
समयों के अंतराल चीरती हुई
अधीरता इच्छा की
याद आती हैं ये सब बातें
अधैर्य नहीं जागता मगर अब
इन सबके याद आने पर

न जागता है कोई पश्चाताप
जीर्णता के जीतने का
शरीर के इस या उस वसंत के बीतने का

दुख नहीं होता
उलटे एक परिपूर्णता-सी
मन में उतरती है

जैसे मौसम के बीत जाने पर
दुख नहीं होता
उस मौसम के फूलों का!

- भवानीप्रसाद मिश्र
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

जाहिल मेरे बाने

मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूँ 
मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ 

मैं असभ्य हूँ क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ 
मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूँ 

आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर 
आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर 

आप सभ्य हैं क्योंकि धन से भरी आपकी कोठी 
आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ लेते हैं पोथी 

आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं 
आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े ख़ून सने हैं 

आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे 
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे 

मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने 
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटे हूँ याने!

- भवानीप्रसाद मिश्र।
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संपादकीय पसंद