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सोमवार, 2 सितंबर 2024

अनुवाद

जब वह गुनगुनाए नहीं
तब समझना वह किसी सोच में है
जब वह सोच में है
तब तुम उसकी आँखें पढ़ना

तुम चाहो तो पढ़ सकते हो
उसकी धड़कन
खुश होगी तो ताल में होगी
कोई रंज-ओ-ग़म होगा
तो सूखे पत्तों की तरह काँप रही होगी

तब तुम उसके माथे पर बोसा देना
उसकी आत्मा को नया जीवन देना
नयनों से झर-झर झरेंगे तब आँसू
उन बूँदों का तुम अनुवाद करना

तुम्हारी गिरह में फिर वह स्वतंत्र होगी
हँसेगी, खिलखिलाएगी, उन्मुक्त होगी
रोम-रोम नवगीत कह उठेगा
उस गीत के तुम नायक बनना

देखो! कितना आसान है न 
एक स्त्री को समझना

- विशाखा मुलमुले
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संपादकीय चयन 

गुरुवार, 29 अगस्त 2024

टुकड़ा भर आसमान

मुझे हासिल टुकड़ा भर आसमान में
मैंने देखना चाहा सूर्योदय, सूर्यास्त
देखना चाहा चँद्रोदय
उसकी घटत-बढ़त

चाहत कि,
चँद्र जब सबसे नज़दीक हो धरा के
तब बिन सीढ़ी लगाए छू सकूँ उसे
न हो तो निहार ही लूँ उसे भर आँख

आस रखी उत्तर में दिख जाए ध्रुव तारा
साँझ ढले दिख जाए चमकीला शुक्र तारा
जब कभी बृहस्पति के नज़दीक से गुज़रे शनि
तो देख लूँ उन्हें अपने ही घर की सीध से

कहने को क्षेत्रफल में अलां-फलां स्क्वायर फुट का घर मेरा
तो हिसाब से उतनी ही बड़ी मिलनी चाहिए थी छत मुझे
पर महानगर की गुज़र-बसर में
हासिल मुझे खिड़की से दिखता टुकड़ा भर आसमान

- विशाखा मुलमुले
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संपादकीय चयन