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गुरुवार, 12 सितंबर 2024

कविता एक पुल है

कविता एक चिड़िया है 
गाहे-बगाहे 
पंख फड़फड़ा लेती है 
क्षणांश ही सही 
टूटता है भीतर का सन्नाटा 

कविता धूप की एक कतरन है 
कौंध उठती है 
परत-दर-परत जमे बादलों पर 
बूँद भर ही सही 
पिघल जाता है रूखा ठंडापन 

कविता लोहे का एक टुकड़ा है 
पर उसे कड़ा बनाकर 
पहना नहीं जा सकता 
कलाइयों में 
न हथियार गढ़कर 
इस्तेमाल किया जा सकता 
अपने ही विरुद्ध 
उसे सिर्फ़ पुल बनाया जा सकता है 
आदमी और आदमी के बीच। 

कविता वह भाषा है जिसे रचने के लिए 
किसी लिपि की नहीं 
ज़रूरत होती है तोड़ने की 
उस खोल को 
पलता है जिसके अंदर हमारा अहं 
हमारी मनीषी मुद्रा 

कविता धान की एक 
कनी हो सकती है 
धरती की कोख को सार्थक करती 
वह उस व्यक्ति का हाथ हो सकती है 
जो बस के हिचकोलों से बचाने के लिए 
किसी ऊँघते बच्चे के 
सिर के पीछे अनायास आ जाता है 

वह टी०बी० के मरीज़ की 
खाँसने की आवाज़ हो सकती है 
रौशनी और हवा के लिए 
छटपटाते केंचुओं से भरी 
दरार हो सकती है 
पर वह विषदंत नहीं हो सकती 
जो ज़हर सिर्फ़ डसने के लिए उड़ेलता है 
दवा के लिए नहीं। 

- निर्मला गर्ग
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संपादकीय चयन 

गुरुवार, 25 जनवरी 2024

शुरुआत होती है यहीं से

निश्चय ही रोटी का सच 
बहुत बड़ा है 
पर आदमी होने का सच 
उससे भी बड़ा है 
मेरी कविता को तलाश है 
उस सड़क की 
जो रोटी से होकर 
आदमी तक जाती है 

पर कोई है -
उसकी आँखों पर 
पट्टी बाँध देता है 
वह जो भी पगडंडी पकड़ती है 
थोड़ी दूर जाकर 
अंधी गली में तब्दील हो जाती है 
जानती हूँ 
वे हाथ किसके हैं 
और शुरुआत होती है यहीं से 
जंग की।

- निर्मला गर्ग।
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संपादकीय चयन 

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता

दिसंबर सर्द है ज़्यादा इस बार 
पहाड़ों पर बर्फ़ गिर रही है लगातार

दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता 
आख़िरी नहीं लगतीं उसकी शामें 
नई भोर की गुज़र चुकी रात नहीं है यह 
भूमिका है उसकी
इस सर्द महीने के रूखे चेहरे पर 
यात्रा की धूल है 
फटी एड़ियों में इस यात्रा की निरंतरता 

दिसंबर के पास सारे महीने छोड़ जाते हैं
अपनी कोई न कोई चीज़ 
जुलाई बारिश 
नवंबर पतझड़ 
मार्च सुगम संगीत 

तेज़ ठंड ने फ़िलहाल धकेल दिया है सभी चीज़ों को 
पृष्ठभूमि में
“पारा शून्य को छूते-छूते रह गया है” 
समाचारों में बताया गया 

ऐसी ही एक सुबह मैं देखती हूँ 
एक तस्वीर
रात है... कुहरा छाया है
अनमना हो आया है कुहरे में बिजली का खंबा
चादर ओढ़े फ़ुटपाथ पर कोई सो रहा है
नीचे लिखा है -

जिन्हें नाज़ है हिंद पर...!

- निर्मला गर्ग।
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विजया सती की पसंद