राजेश्वर वशिष्ठ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेश्वर वशिष्ठ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

जानकी के लिए

मर चुका है रावण का शरीर
स्तब्ध है सारी लंका
सुनसान है किले का परकोटा
कहीं कोई उत्साह नहीं
किसी घर में नहीं जल रहा है दिया
विभीषण के घर को छोड़कर।

सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम
विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए
ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक
बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं
अपने सहयोगियों की कुशल क्षेम
चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान!
मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण
कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को
अशोक वाटिका से
पर कुछ कह नहीं पाते हैं।

धीरे-धीरे सिमट जाते हैं सभी काम
हो जाता है विभीषण का राज्याभिषेक
किंतु राम प्रवेश नहीं करते लंका में
बाहर ही ठहरते हैं एक ऊँचे टीले पर।

भेजते हैं हनुमान को अशोक-वाटिका
यह समाचार देने के लिए
कि मारा गया है रावण
और अब लंकाधिपति हैं विभीषण।

सीता सुनती हैं इस समाचार को
और रहती हैं ख़ामोश 
कुछ नहीं कहती
बस निहारती है रास्ता
रावण का वध करते ही
वनवासी राम बन गए हैं सम्राट?
लंका तक पहुँचकर भी भेजते हैं अपना दूत
नहीं जानना चाहते एक वर्ष कहाँ रही सीता
कैसे रही सीता?
नयनों से बहती है अश्रुधार
जिसे समझ नहीं पाते हनुमान
कह नहीं पाते वाल्मीकि।

राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन परिचारिकाओं से
जिन्होंने मुझे भयभीत करते हुए भी
स्त्री की पूर्ण गरिमा प्रदान की
वे रावण की अनुचरी तो थीं
पर मेरे लिए माताओं के समान थीं।
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन अशोक वृक्षों से
इन माधवी लताओं से
जिन्होंने मेरे आँसुओं को
ओस के कणों की तरह सहेजा अपने शरीर पर
पर राम तो अब राजा हैं
वह कैसे आते सीता को लेने?
विभीषण करवाते हैं सीता का शृंगार
और पालकी में बिठाकर पहुँचाते हैं राम के भवन पर
पालकी में बैठे हुए सीता सोचती है
जनक ने भी तो उसे विदा किया था इसी तरह!

वहीं रोक दो पालकी,
गूँजता है राम का स्वर
सीता को पैदल चलकर आने दो मेरे समीप!
ज़मीन पर चलते हुए काँपती है भूमिसुता
क्या देखना चाहते हैं
मर्यादा पुरुषोत्तम, कारावास में रहकर
चलना भी भूल जाती हैं स्त्रियाँ?
अपमान और उपेक्षा के बोझ से दबी सीता
भूल जाती है पति मिलन का उत्साह
खड़ी हो जाती है किसी युद्ध-बंदिनी की तरह!
कुठाराघात करते हैं राम - सीते, कौन होगा वह पुरुष
जो वर्ष भर पर-पुरुष के घर में रही स्त्री को
करेगा स्वीकार?
मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, तुम चाहे जहाँ जा सकती हो।
उसने तुम्हें अंक में भरकर उठाया
और मृत्यु पर्यंत तुम्हें देखकर जीता रहा
मेरा दायित्व था तुम्हें मुक्त कराना
पर अब नहीं स्वीकार कर सकता तुम्हें पत्नी की तरह!
वाल्मीकि के नायक तो राम थे
वे क्यों लिखते सीता का रुदन
और उसकी मनोदशा?
उन क्षणों में क्या नहीं सोचा होगा सीता ने
कि क्या यह वही पुरुष है
जिसका किया था मैंने स्वयंवर में वरण
क्या यह वही पुरुष है जिसके प्रेम में
मैं छोड़ आई थी अयोध्या का महल
और भटकी थी वन, वन!
हाँ, रावण ने उठाया था मुझे गोद में
हाँ, रावण ने किया था मुझसे प्रणय निवेदन
वह राजा था चाहता तो बलात ले जाता अपने रनिवास में
पर रावण पुरुष था,
उसने मेरे स्त्रीत्व का अपमान कभी नहीं किया
भले ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम न कहलाए इतिहास में!
यह सब कहला नहीं सकते थे वाल्मीकि
क्योंकि उन्हें तो रामकथा ही कहनी थी!
आगे की कथा आप जानते हैं
सीता ने अग्नि-परीक्षा दी
कवि को कथा समेटने की जल्दी थी
राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौट आए
नगर वासियों ने दीपावली मनाई
जिसमें शहर के धोबी शामिल नहीं हुए।

आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ उस रावण के लिए
जिसकी मर्यादा
किसी मर्यादा पुरुषोत्तम से कम नहीं थी।
मैं उदास हूँ कवि वाल्मीकि के लिए
जो राम के समक्ष सीता के भाव लिख न सके।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ स्त्री अस्मिता के लिए
उसकी शाश्वत प्रतीक जानकी के लिए! 

- राजेश्वर वशिष्ठ
---------------

अनूप भार्गव के सौजन्य से 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

क्षमा-पत्र

सारी दुनिया की स्त्रियों
मुझे क्षमा कर देना उन सभी अपराधों के लिए
जो मैं आज तक करता रहा तुम पर। 

कुछ अपराध अनजाने में भी हुए होंगे
और कुछ किए गए होंगे इसलिए
कि तुम्हारी आँखों की इबारतें पढ़कर
डगमगाई होगी मेरी सत्ता
तिलमिलाया होगा मेरा अहम।

मुझे बचपन से सिखाया गया था
तुम हारने के लिए नहीं बने हो।

तुम्हें देखकर हर बार बेचैन हो जाता था मैं 
पकड़कर क़ैद करना चाहता था
उन तितलियों को 
जो मँडराती थी तुम्हारे चेहरे के इर्द-गिर्द
रस-रंग की खोज में
मैं भी छूकर देखना चाहता था उन सपनों को
जो तैर रहे थे तुम्हारी आँखों में।

तुम्हारा मन तुम्हारा था
तुम्हारे सपने भी तुम्हारे थे
और शरीर भी केवल तुम्हारा ही था
उनसे जुड़े निर्णय भी सब तुम्हें ही लेने थे।

सिकंदर की तरह निकलता है हर पुरुष
पूरी दुनिया फतह करने
बिना यह जाने कि अगर 
उसने जीत भी ली सारी दुनिया
तो क्या उसे भोग पाएगा समग्रतः
हर सिकंदर मरता ही है किसी तीर की नोक से 
बरसों इस सत्य का अहसास ही नहीं हुआ मुझे।

सुनेत्रा,
आज, बुद्ध की साक्षी में लिख रहा हूँ यह बयान
जो ध्यानमग्न हैं!
पता नहीं वह इस शपथ-पत्र के
गवाह बनना चाहते हैं या नहीं
उनसे बेहतर कौन समझता है पुरुष-मन!

इसलिए
सारी दुनिया की स्त्रियों
मुझे क्षमा कर देना उन सभी अपराधों के लिए
जो मैं आज तक करता रहा तुम पर। 

- राजेश्वर वशिष्ठ
-----------------

अनूप भार्गव के सौजन्य से