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सोमवार, 13 जनवरी 2025

नदी का आवेग

पर्वतों के बीच बहती
नदी का आवेग
जैसे

अश्रु बनकर बिखरने से पूर्व
हड्डियों को ठकठकाता हुआ कोई दर्द
रिक्त मन की घाटियों को चीर जाए।

- जगदीश गुप्त
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संपादकीय चयन 

सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

सुना है कभी तुमने रंगों को

कभी-कभी
उजाले का आभास
अँधेरे के इतने क़रीब होता है
कि दोनों को अलग-अलग
पहचान पाना मुश्किल हो जाता है।

धीरे-धीरे
जब उजाला
खेलने-खिलने लगता है
और अँधेरा उसकी जुंबिश से
परदे की तरह हिलने लगता है
तो दोनों की
बदलती हुई गति ही
उनकी सही पहचान बन जाती है।

रौशन अँधेरे के साथ
लाली की नामालूम-सी झलक
एक ऐसा रंग रच देती है
जो चितेरे की आँख से ही
देखा जा सकता है।
क्योंकि उसका कोई नाम नहीं होता।
फिर रंगों के नाम
हमें ले ही कितनी दूर जाते हैं?
कोश में हम उनके हर साये के लिए
सही शब्द कहाँ पाते हैं?
रंगों की मिलावट से उपजा
हर अंतर, हर अंतराल 
एक नए रंग की संभावना बन जाता है
और अपना नाम स्वयं ही
अस्फुट स्वर में गाता है

कभी सुना है तुमने
प्रत्यक्ष रंगों को गाते हुए?
एक साथ स्वर-बद्ध होकर
सामने आते हुए?

- जगदीश गुप्त
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

बुधवार, 5 जून 2024

कवि वही

कवि वही जो अकथनीय कहे
किंतु सारी मुखरता के बीच मौन रहे
शब्द गूँथे स्वयं अपने गूथने पर
कभी रीझे कभी खीझे कभी बोल सहे
कवि वही जो अकथनीय कहे
सिद्ध हो जिसको मनोमय मुक्ति का सौंदर्य साधन
भाव झंकृति रूप जिसका अलंकृति जिसका प्रसाधन
सिर्फ़ अपना ही नहीं सबका ताप जिसे दहे
रुष्ट हो तो जगा दे आक्रोश नभ का
द्रवित हो तो सृष्टि सारी साथ-साथ बहे।

शक्ति के संचार से
या अर्थ के संभार से
प्रबल झंझावात से
या घात-प्रत्याघात से
जहाँ थकने लगे वाणी स्वयं हाथ गहे।

शांति मन में क्रांति का संकल्प लेकर टिकी हो
कहीं भी गिरवी न हो ईमान जिसका
कहीं भी प्रज्ञा न जिसकी बिकी हो
जो निरंतर नई रचना-धर्मिता से रहे पूरित
लेखनी जिसकी कलुष में डूबकर भी
विशद उज्जवल कीर्ति लाभ लहे
कवि वही जो अकथनीय कहे
 
- जगदीश गुप्त 
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

यात्री-मन

छल-छलाई आँखों से
जो विवश बाहर छलक आए
होंठ ने बढ़कर वही
आँसू सुखाए
सिहरते चिकने कपोलों पर
किस अपरिभाषित
व्यथा की टोह लेती
उँगलियों के स्पर्श गहराए।

हृदय के भू-गर्भ पर
जो भाव थे
संचित-असंचित
एक सोते की तरह
फूटे बहे,
उमड़े नदी-सागर बने
फिर भर गए आकाश में
घुमड़ कर
बरसे झमाझम
हो गया अस्तित्व जलमय

यात्रा पूरी हुई, लय से प्रलय तक,
देहरी से देह की चलकर, हृदय तक।

एक दृढ़ अनुबंध फिर से लिख गया
डूबते मन को किनारा दिख गया।

- जगदीश गुप्त।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद