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सोमवार, 25 मार्च 2024

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली!
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली
मली मुख-चुंबन-रोली।

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मंद हँस अधर-दशन अनबोली
कली-सी काँटे की तोली।

मधु-ऋतु-रात, मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली
बनी रति की छवि भोली।

बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल, मुख-लट, पट, दीप बुझा, हँस बोली
रही यह एक ठिठोली।

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।
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विडियो हिंदी कविता से साभार।


रविवार, 10 दिसंबर 2023

पास तुम रहो

कुछ न हुआ, न हो। 
मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल 
पास तुम रहो!
 
मेरे नभ के बादल यदि न कटे— 
चंद्र रह गया ढका, 
तिमिर रात को तिरकर यदि न अटे 
लेश गगन-भास का, 
रहेंगे अधर हँसते, पथ पर, तुम 
हाथ यदि गहो। 

बहु-रस साहित्य विपुल यदि न पढ़ा— 
मंद सबों ने कहा— 
मेरा काव्यानुमान यदि न बढ़ा— 
ज्ञान जहाँ का रहा, 
रहे, समझ है मुझमें पूरी, तुम 
कथा यदि कहो। 

- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
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