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रविवार, 17 नवंबर 2024

दादू जी

 

दादू मेरी उँगली पकड़ो

तुम को चलना सिखलाऊँगा ।

 

ले कर छड़ी निकलने पर भी

ठोकर खायदि गिर जाओगे

कौन सँभालेगा तब तुम को

फिर घर तक कैसे आओगे?

रुको!अभी मैँ सँग-सँग चल कर

तुम को घर तक ले आऊँगा।

 

हाथ तुम्हारे काँप रहे हैं

टोस्ट छिटक कर गिर जाता है

फिर धरती पर पड़े हुए को

टॉमी, झट-पट आ खाता है

रुको! अभी तुम कुल्ला कर लो

गरम चाय मैं पिलवाउँगा ।

 

ठंड बहुत है इसीलिए तुम

नहाने  में आलस करते हो

सुबह सैर को जाने में भी

जाने क्यों बेहद डरते हो?

रुको! अभी मैं साथ तुम्हारे

चल कर सैर करा लाऊँगा ।

 

मैँ ने देखा सारे दिन तुम

बच्चों जैसी बातें करते

दोपहरी में सो जाते पर

हुए अकेले आँसू झरते

रुको!, अभी तुम आँसू पोंछो

फिर गीता मैं पढ़वाऊँगा ।।

 

- मुकुट सक्सेना

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शिवानंद सिंह सहयोगी की पसंद 

गुरुवार, 27 जून 2024

प्रतिबिंब

गहरी हुई दरारों को भरने का यत्न करूँ
या फिर रहूँ देखता इन दरकी दीवारों को?

चटखे हुए दर्पणों में
प्रतिबिंब बिखरते हैं
अपने चेहरे की विकृति के
वहम उभरते हैं 
किर्च-किर्च हो गए आईने से क्या मोह रखूँ
या फिर करूँ सुपुर्द इसे भी गई बहारों को?

अनगिनती थे साथ,
साथ चलने का ध्येय लिए
इसी भावना के अंतर्गत 
विष के घूँट पिए
सहता रहूँ यही दुरस्थिति,अधर सिले रख कर
या फिर कर दूँ व्यक्त हृदय में उठे गुबारों को?

किल-किल काँटे जहाँ
बनी हों शंकाएँ मन पर
दीवारें धुल सकें नहीं 
है जल इतना घन पर
खुली हुई पुस्तक जैसे अंतस की बाँह गहूँ
या फिर रहूँ निभाता इन थोथे
 व्यवहारों को?

- मुकुट सक्सेना
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शिवानंद सहयोगी के सौजन्य से