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बुधवार, 22 मई 2024

आज है, कल हुई

आज है, कल हुई, हुई, न हुई
छाँव हर पल हुई, हुई, न हुई

एक पहेली है ज़िंदगी अपनी
क्या पता हल हुई, हुई, न हुई

देह का फ़लसफ़ा बताता है
कल ये संदल हुई, हुई, न हुई

जो नदी तुझमें - मुझमें बहती है
उसमें कलकल हुई, हुई, न हुई

ये नुमाइश तो चार दिन की है
फिर ये हलचल हुई, हुई, न हुई

मानकर घास रौंद मत इसको
कल ये मखमल हुई, हुई, न हुई

जितना जी चाहे उतनी पी ले तू
फिर ये बोतल हुई, हुई, न हुई

- उर्मिलेश
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

प्रस्तुतकर्ता की नेक सलाह - यहाँ बोतल का अर्थ ज़िंदगी समझें (उमर ख़य्याम की रुबाई और बच्चन की मधुशाला की तरह), दारू की बोतल नहीं।

रविवार, 21 अप्रैल 2024

सृजन बिकने नहीं देंगे

भले ही तुम प्रलोभन दो हमें अपनी कृपाओं के,
मगर हम लेखनी का बांकपन बिकने नहीं देंगे।
भले बाग़ी बताओ या हमें फाँसी चढ़ाओ तुम,
मगर हम मौत के डर से सृजन बिकने नहीं देंगे।

वही हमने लिखा है आज तक जो कुछ सहा हमने
भला डर कर किसी भी रात को कब दिन कहा हमने
इसी से हम उपेक्षित रह गए उनकी सभाओं में
न उनके साथ महफ़िल में लगाया कहकहा हमने।

निमंत्रण मिल रहे हैं आज भी सुविधा भरे हमको
मगर तन के लिए खुद्दार मन बिकने नहीं देंगे।

- उर्मिलेश।
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से