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सोमवार, 20 नवंबर 2023

पहाड़ में पिता

पहाड़ में पिता
मौल्यार जैसे थे
जिसके साल में एक बार आने की उम्मीद भर से 
कट जाता था सारा साल

पिता की आमद से पहले
चिट्ठी आती थी उनके आने की
और सब कुछ बदल जाता था

माँ के झुर्रियों भरे चेहरे पर 
जम जाती थी हँसी की महीन परत।
लहज़े में उसके बनाए मक्खन जैसी
आ जाती थी नरमाई।

एक रोटी ज़्यादा माँग लेने पर
चूल्हे से जलती लकड़ी निकाल लेने वाली माँ
मनुहार करके खिलाने लगती थी 
घर चौक से लेकर गुठयार तक 
लीप डालती थी एक दिन में।

पिता के आने की खबर भर से 
चीज़ों के दिन सुधरने लगते थे
धूल सनी किताबों, कपड़ों और बस्तों पर
सजने लगते थे पैबंद।

पिता हर बार बालों में 
चाँदी की एक लहर बढ़ाकर लौटते
हर बार पहले से ज़्यादा झुके होते उनके कंधे 
और हमारे सर पर हाथ रखने को उन्हें
हर बार पहले से कम झुकना पड़ता।

चेहरे पर एक पहचानी-सी अजनबियत ओढ़े पिता 
कम बोलते, कम पूछते
बस देखते रहते
जैसे सब कुछ आँखों में कैद कर लेना चाहते हों

माँ ज़्यादातर वक़्त घर पे बिताती
साल दो धोतियों में काट कर
बचाई दो नई धोतियाँ पहनकर माँ नई सी लगती
पिता के मुँह से फलाने की माँ सुनते ही
चकित हिरणी सी कुलाँचे भरती आ जाती

पिता के लाए नए कपड़ों की जेबें
गुड़ चने से भरी रहती
चौक पिता से मिलने वालों से।

पढ़ाई के लिए लैम्प चमकाने की हममें होड़ मची रहती 
समवेत स्वर में हमें पढ़ते कम चिल्लाते ज़्यादा देखते पिता
बस देखते रहते।

और फिर एक दिन मौल्यार बीत जाती
हाथों में कुछ पैसे और हिदायतें देकर 
पिता लौट जाते

लौटते पिता से हम गले मिलना चाहते
कहना चाहते कि मत जाओ 
यहाँ भी तो दुकान में गुड़ चना मिल ही जाता है
रहो यहीं 
सिखाओ हमें हल जोतना,खाट बुनना
तुम रहते हो 
तो उकाल भी ऊँधार हो जाती है पिता

हालाँकि कभी कह नहीं पाए
शायद यही सुनने के लिए बार-बार लौटते रहे पिता।

- दीपिका ध्यानी घिल्डियाल।
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विजया सती के सौजन्य से

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मौल्यार - वसंत
उकाल - चढ़ाई
ऊँधार - उतराई
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शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

कविता को इतना सरल होना चाहिए

कविता को इतना सरल होना चाहिए 
जितनी मुस्कान की भाषा

कवि को भी इतना सरल होना चाहिए
जितना दस का पहाड़ा

कविता और उसके कवि के लिए 
दुनिया को इतना सरल होना चाहिए
जितना मेरे लिए तुम।

- दीपिका ध्यानी घिल्डियाल।
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विजया सती के सौजन्य से 

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

माँ

माँ,
इस बार जब घर आऊँ 
तो मत थमाना चुपके से कुछ पैसे,
मत बाँधना पोटलियाँ, दालों, मडवे, चावल और च्यूड़े की 
मत देना अपनी नातिन के लिए हँसुली और धागुली
मत जाना नदी पार के गाँव, मेरे लिए कुछ अखरोट लाने
माँ, हो सके तो दे देना
मेरे बचपन की वो पाजेब जिसे पहन 
मैं नापती थी धरती और आकाश,
सुनना चाहती हूँ
उन आज़ाद क़दमों और उस पाजेब का संगीत
मैं जानती हूँ तुमने संभाल रखें होंगे,
मेले ना जाने देने पर टपके हुए आँसू,
और लुका-छिपी के खेल में, दबाई हुई मेरी हँसी,
दोनों देना,
दोनों को मिलाकर भर दूँगी अपनी बेरंग शामें।
इस बार देना ही चाहो तो देना,
बाँज की कुछ पौध और आँगन की थोड़ी सी मिट्टी
मैं रोप दूँगी उन्हें हर उस जगह 
जहाँ खुद होना चाहती हूँ।
अपनी दरांती और अपनी हिम्मत भी देना,
मैं अक्सर डरती हूँ शाम को घर लौटते हुए
माँ, मत विदा करना इस बार नम आँखों से,
बस मेरा छूटा हुआ सब साथ कर देना
और थोड़ी सी खुद भी चली आना मेरे साथ।

-दीपिका ध्यानी घिल्डियाल।
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विजया सती की पसंद

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हंसुली धागुली - उत्तराखंड में नवजात शिशु को नामकरण संस्कार में दिए जाने वाले आभूषण

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सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

माँ कभी स्कूल नहीं गई

माँ कभी स्कूल नहीं गई
इसीलिए नहीं पढ़ पाई 
कभी कोई किताब
बस दस तक गिन पाती है
उंगलियों में 

........रही हमेशा गाँव में 
सो शहर भी बहुत कम देखा
माँ बहुत कम लोगों से मिली
शायद ही कभी सुनी हो 
किसी बहुत पढ़े-लिखे की कोई बात
धीरे-धीरे बूढी होती माँ
सारी उम्र अपने पालतुओं के बीच रही
इंसानों से ज्यादा 
जंगलों में अकेले भटकती रही
एक-एक मुठ्ठी घास के लिए

ग़ुस्से, प्यार और दुख के अलावा
शायद नहीं जानती कोई मानवीय भाव
नहीं समझती 
शायद 
नागरिक होने के अपने अधिकार
टीवी में खबरों वाले वक़्त 
रसोई में सेंक रही होती है रोटियाँ
दुनिया का मतलब समझती है 
अपना परिवार और गाँव

बहुत सरल और साहसी मेरी माँ
बस एक बात जानती है
कि जंगल, घर और कहीं भी बाहर
बिना दरांती नहीं जाना है
इंसान जानवर नहीं 
कि सिर्फ़ भूखे पेट ही हमलावर हों
इंसान 
कहीं भी घात लगाए मिल सकते हैं।

- दीपिका ध्यानी घिल्डियाल।
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विजया सती की पसंद 

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2023

पहाड़ की लड़कियाँ

पहाड़ की लड़कियों को
जब शहरों में बसना पड़ता है
बसा लेती हैं अपने आस-पास एक छोटा-सा पहाड़!
मायके से लौटते हुए भर लाती हैं कंडाली 
और फ्योली की पौध रोपती हैं
ठीक दरवाजे के पास वाले गमले में
इनके किचन से उठती है हर दूसरे दिन
फांणु और चैसें की महक
जिसे सबके जाने के बाद फर्श पर बैठ खाती हैं
इनके बटुए से ज्यादा इनके संदूक में होते हैं
देवता के नाम के सिक्के
हारी-बीमारी और पति की शराब छुड़ाने के नाम पर निकाले हुए
पहाड़ की लड़कियाँ
सावन और चैत में हो जाती हैं बेवजह उदास
हर पहाड़ी बोलने वाले से 
खोज लाती हैं नानके, दादके का कोई रिश्ता
और देती हैं घर आने का न्यौता
माँ के भेजे घी को कंजूसी से खर्च करती हैं 
और फेंकती नहीं पार्सल से बंधी हुई सुतली भी
पहाड़ की लड़कियाँ 
पहाड़ से दूर हों तब भी पहाड़ इनसे दूर नहीं होता

- दीपिका ध्यानी घिल्डियाल।

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विजया सती की पसंद