केदारनाथ अग्रवाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
केदारनाथ अग्रवाल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 मई 2025

बसंती हवा

 हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!

वही हाँ, वही जो युगों से गगन को


बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए हूँ;

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।


वही हाँ, वही जो धरा का बसंती

सुसंगीत मीठा गुँजाती फिरी हूँ;


हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।

वही हाँ, वही जो सभी प्राणियों को


पिला प्रेम-आसव जिलाए हुए हूँ,

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।


क़सम रूप की है, क़सम प्रेम की है,

क़सम इस हृदय की, सुनो बात मेरी—


अनोखी हवा हूँ, बड़ी बावली हूँ!

बड़ी मस्तमौला, नहीं कुछ फ़िकर है,


बड़ी ही निडर हूँ, जिधर चाहती हूँ

उधर घूमती हूँ, मुसाफ़िर अजब हूँ!


न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा,

न इच्छा किसी की, न आशा किसी की,


न प्रेमी, न दुश्मन,

जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ!


हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।

जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं,


शहर, गाँव, बस्ती,

नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर,


झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं,

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।


चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया,

गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर,


उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू’

उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुँची—


वहाँ गेहुँओं में लहर ख़ूब मारी,

पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक


इसी में रही मैं।

खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी,


मुझे ख़ूब सूझी!

हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी!


इसी हार को पा,

हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों,


मज़ा आ गया तब,

न सुध-बुध रही कुछ,


बसंती नवेली भरे गात में थी!

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!


मुझे देखते ही अरहरी लजायी,

मनाया-बनाया, न मानी, न मानी,


उसे भी न छोड़ा—

पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला,


लगी जा हृदय से, कमर से चिपक कर,

हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ,


हँसे लहलहाते हरे खेत सारे,

हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी,


बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी!

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।


- केदारनाथ अग्रवाल 

-----------------------

- हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शनिवार, 26 अप्रैल 2025

जो शिलाएँ तोड़ते हैं

ज़िंदगी को
वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं,
लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं,
शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
ज़िंदगी को
वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं,
रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं।
यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के
श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!!
मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा।
ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।

- केदारनाथ अग्रवाल

-----------------------

- हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 
 

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

धूप का गीत

धूप धरा पर उतरी 
जैसे शिव के जटाजूट पर 
नभ से गंगा उतरी। 

धरती भी कोलाहल करती 
तम से ऊपर उभरी
धूप धरा पर बिखरी

बरसी रवि की गगरी, 
जैसे ब्रज की बीच गली में 
बरसी गोरस गगरी। 

फूट-कटोरों-सी मुस्काती
रूप-भरी है नगरी
धूप धरा पर बिखरी

- केदारनाथ अग्रवाल।
-----------------------

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

प्रभात

रात अपने ख़ेमे को उखाड़कर चली गई, 
पानी के बँधे हुए जूड़े में सरोज खिले 
और नई रौशनी जवान हुई।

- केदारनाथ अग्रवाल।
-----------------------

संपादकीय चयन 

मंगलवार, 2 जनवरी 2024

गए साल की

गए साल की
ठिठकी ठिठकी ठिठुरन
नए साल के
नए सूर्य ने तोड़ी।

देश-काल पर,
धूप-चढ़ गई,
हवा गरम हो फैली,
पौरुष के पेड़ों के पत्ते
चेतन चमके।

दर्पण-देही
दसों दिशाएँ
रंग-रूप की
दुनिया बिंबित करती,
मानव-मन में
ज्योति-तरंगे उठतीं।

- केदारनाथ अग्रवाल।
-----------------------

संपादकीय चयन 

मंगलवार, 19 दिसंबर 2023

ओस की बूंद कहती है

ओस-बूंद कहती है, लिख दूँ
नव-गुलाब पर मन की बात।

कवि कहता है, मैं भी लिख दूँ
प्रिय शब्दों में मन की बात।

ओस-बूंद लिख सकी नहीं कुछ
नव-गुलाब हो गया मलिन।

पर कवि ने लिख दिया ओस से
नव-गुलाब पर काव्य नवीन।

- केदारनाथ अग्रवाल।
-----------------------

संपादकीय चयन