कुँअर बेचैन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कुँअर बेचैन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

प्रीति में संदेह कैसा

प्रीति में संदेह कैसा?
यदि रहे संदेह, तो फिर—
प्रीति कैसी, नेह कैसा?
प्रीति में संदेह कैसा!

ज्योति पर जलते शलभ ने
धूप पर आसक्त नभ ने
मस्त पुरवाई-नटी से
नव प्रफुल्लित वन-विभव ने—
प्रश्न पूछा, ‘कोई नित-नित
परिजनों से भी सशंकित
हो अगर 'तो गेह कैसा?’
प्रीति में संदेह कैसा!

नींद पर संदेह दृग का
पंख पर उड़ते विहग का
हो अगर संदेह मग पर
प्रीति-पग के नेह-डग का
तो कहा प्रिय राधिका ने
नेह-मग की साधिका ने
बूँद बिन घन-मेह कैसा?
प्रीति में संदेह कैसा!

- कुँअर बेचैन
---------------

हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

रविवार, 8 सितंबर 2024

रिश्तों को घर दिखलाओ

माँ की साँस
पिता की खाँसी
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

छोड़ चेतना को
जड़ता तक
आना जीवन का
पत्थर में परिवर्तित पानी
मन के आँगन का-
यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं।
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

संबंधों को
पढ़ती है
केवल व्यापारिकता
बंद कोठरी से बोली
शुभचिंतक भाव-लता-
'रिश्तों को घर दिखलाओ, दूकान नहीं।'
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

- कुँअर बेचैन
--------------

संपादकीय चयन 

शनिवार, 7 सितंबर 2024

आँगन की अल्पना सँभालिए

दरवाज़े तोड़-तोड़कर
घुस न जाएँ आँधियाँ मकान में,
आँगन की अल्पना सँभालिए।

आई कब आँधियाँ यहाँ
बेमौसम शीतकाल में
झागदार मेघ उग रहे
नर्म धूप के उबाल में
छत से फिर कूदे हैं अँधियारे
चँद्रमुखी कल्पना सँभालिए‌।

आँगन से कक्ष में चली
शोरमुखी एक खलबली
उपवन-सी आस्था हुई
पहले से और जंगली
दीवारों पर टँगी हुई
पंखकटी प्रार्थना सँभालिए।

- कुँअर बेचैन
---------------

संपादकीय चयन 

शनिवार, 25 मई 2024

चल हवा

चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल
चल वहाँ तक जिस जगह मेरी प्रिया
गा रही होगी नई ताजा ग़ज़ल 
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

चल जहाँ मेरा अमर विश्वास है
आत्माओं में मिलन की प्यास है
आज तक का तो यही इतिहास है
है जहाँ मधुवन वहीं पर रास है
मिल गया जिसको कि कान्हा का पता
कौन राधा है जरा तू ही बता
जो कन्हैया से करेगी प्रीति छल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

मत फँसा सुख चक्र दुख की कील में
मत उठा तूफ़ान दुख की झील में
हो सके तो रख नए जलते दिये
आस के बुझते हुए कंदील में
तू हवा है कर सुरभि का आचमन
छोड़कर अपने पुराने ये बसन
तू नए अहसास के कपड़े बदल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

चल जहाँ तक बाँसुरी की धुन चले
फूल की खुशबू चले, गुनगुन चले
भीग जा तू प्रीति के हर रंग में
साथ जब तक प्राण का फागुन चले
पूछ मत अब जा रहा हूँ मैं कहाँ
चल प्रतीक्षा में खड़े होंगे जहाँ
एक नीली झील, दो नीले कमल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

- कुँअर बेचैन 
----------------

हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

रविवार, 7 अप्रैल 2024

तू इतना प्यार न कर मुझसे

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ! 

जो प्यारी लगे सभी को ही 
मैं ऐसी कोई बात नहीं 
हूँ मरुस्थल की सूखी रेती 
मैं मेघ बनूँ औक़ात नहीं 

पर मेघ बनूँ तो यह मन है 
तेरे घर-आँगन में बरसूँ! 

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ! 

पानी था, लेकिन दुनिया ने 
कह दिया मुझे पत्थर-काया 
सबकी नज़रों का काँटा मैं 
खिलकर भी फूल न बन पाया 

हाँ, अगर कभी मैं फूल बनूँ 
तेरी फुलबग़िया में सरसूँ! 

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ!

- कुँअर बेचैन।
---------------