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शनिवार, 13 अप्रैल 2024

उषा की लाली

उषा की लाली में
अभी से गए निखर
हिमगिरि के कनक शिखर!

आगे बढ़ा शिशु रवि
बदली छवि, बदली छवि
देखता रह गया अपलक कवि
डर था, प्रतिपल
अपरूप यह जादुई आभा
जाए ना बिखर, जाए ना बिखर...

उषा की लाली में
भले हो उठे थे निखर
हिमगिरि के कनक शिखर!

- नागार्जुन।
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शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

मेरी भी आभा है इसमें

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है 
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है 
मेरी भी आभा है इसमें 
भीनी-भीनी ख़ुशबूवाले 
रंग-बिरंगे 
यह जो इतने फूल खिले हैं 
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था 
कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था 
पकी सुनहली फ़सलों से जो 
अबकी यह खलिहान भर गया 
मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुस्काती हैं 
नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है 
यह विशाल भूखंड आज जो चमक रहा है 
मेरी भी आभा है इसमें

- नागार्जुन।
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