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मंगलवार, 19 नवंबर 2024

अलगाव


दूर तुम तब भी थे
दूर तुम अब भी हो
बदली है बस
दूरी की तासीर
तुम्हारे-मेरे बीच
कभी थीं आम की घनी अमराइयाँ
बौराई हुई
मादक दूरी
अब उग आए हैं बीच
कैक्टस के जंगल
जो तुम तक पहुँचने की
हर लहराती कोशिश को तोड़ देते हैं
यह तीखापन
हो सकता है तुम्हारी मजबूरी
पर सोचो तो
कौन-सा चेहरा सजता है
खँरोचों से
अपनापे का ऊष्म-ज्वार
उमड़ता है होंठों पर
पर स्पर्श पाते ही तुम्हारी ठंडी पाषाणी दृष्टि का
जम जाती है
एक जीवंत धारा
और मैं ठिठुरती रहती हूँ
हिमनदी-सी
एक मख़मली हरियाली थी
तुम्हारे-मेरे बीच
न जाने क्यों लगता है अब
हरियाली एक घातक नकाब है
नीचे खुदी हैं बारूदी खँदकें
पाँव धरते ही
फटेगी तुम्हारे होंठों पर
डायनामाइट की तरह एक मुस्कान
और जला देगी मुझे
मैं
जो हरियाली की ठगी
उसे बारूद का जंगल
मान नहीं पाती
नहीं मान पाती
तुम्हारे-मेरे बीच
अब सिर्फ़ सन्नाटा है
बुनते रहते हैं हम
एक ख़ामोशी 
आँखों से आँखों तक
कुछ न कहना
तुम्हारी समझदारी है शायद
पर दर्द का यह बाँझपन
सालता रहता है मुझे
रिसती रहती हूँ
गुमसुम
आँखों के कोरों से
दर्द को सींचना
फर्ज़ होता है उनके लिए
दर्द ही जिनकी पहचान होती है।


 - रेखा
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संपादकीय चयन 

मंगलवार, 12 नवंबर 2024

बाँसुरी

 उपमा अलंकार

मुझ पर न लादो बरबस

आओ

मैं अपना परिचय स्वयं दूँ


मैं

एक खोखला

कुरूप बाँस हूँ

खंडित और छिद्रमय

मेरे भीतर

दीर्घशून्य है

पर जब तुम

छूते हो मेरी अनघड़ काया को

अपने थरथराते अधरों से

तो

मैं भूल जाती हूँ खुद को


लगता है

मैं कुछ 'और' भी हूँ

मेरा परिचय

कुछ 'और' भी है


तुम कह दो

कह दो न तुम

तुम बाँस ही नहीं

हो

बाँसुरी भी।


 - रेखा

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संपादकीय चयन 

रविवार, 10 नवंबर 2024

बोध

दूसरे ही दिन

आँगन के आर-पार

परस दी

किलटे-किलटे धूप

तुलसी के दाहिने

बिछाया वही पीढ़ा वही तकिया

तुम्हारी अम्मा के काढ़े हुए फूल

सुबह से दोपहर गए

चूल्हे पर पकती रही

मास की दाल

कुंडी में घिसती रही

पुदीने की चटनी

शाम चाय के साथ

आज भी तले

कचनार के कुरकुरे फूल

रात खाने से पहले

मेज़ पर आमने-सामने

घूरती रही दो थालियाँ

एक-दूसरे का बंद चेहरा


फिर आधी रात

देखी मैंने 

तुम्हारे हिस्से की चादर

उघड़ी हुई-बेझिझक

तकिये पर से ग़ायब था

तुम्हारे सिर का निशान

अलमारी में एक के बाद एक

बाँह लटकाए कोट

बाथरूम में ब्रश

मेज़ पर खुली किताब

बिटिया के नाम लिखा पत्र

हर कहीं हर चीज़ पर

छपे थे तुम्हारे हाथों के निशान

एक चीख़

छत चढ़ गई

सीढ़ियाँ उतर गईं

मेरी छाती में से

पँख छुड़ा

फड़फड़ा कर उड़ा

तुम्हारा नाम

सब दीवारों से टकराकर

बिछ गया फर्श पर

नीला पथराया

मौत सूँघा कबूतर।


 - रेखा

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हरप्रीत सिंह पुरी  के सौजन्य से