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बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

जय घोष एक त्रासदी है

बहुत भोले हो तुम
बार-बार धोखा खाकर भी तुम
गढ़ने लगते हो
एक मूर्ति
किसी नायक की
जो खोलेगा
तुम्हारी गिरह गाँठ
सहलाएगा उन ज़ख़्मों को
जो रिस रहें हैं सदियों से
उसके पास होगी
फूलों वाली जादू की छड़ी
हवा में घुमाएगा गोल-गोल
कहेगा हाँ!
मैं ही तो हूँ
मुक्तिदाता
मेरे पीछे आओ
तुमने भी सुनी तो थी बचपन में
उस बाँसुरी वादक की कहानी
जिसके पीछे चल दिए थे
सब के सब चूहे।
बार-बार भूल जाते हो
बहुत भोले हो यार
बचो उन आवाज़ों से
जो बहुत तेज़ होती हैं
जय घोष त्रासदी
हर जीत मानव की छाती पर हुआ घाव है।
कविता अभी ज़िंदा है
संगीत की लहरी
और
फूलों की घाटी का स्वप्न ज़िंदा है अभी।

-  राजेश अरोड़ा
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

मंगलवार, 24 सितंबर 2024

जीत कैसी होगी

वो जिन्होंने चाहा था युद्ध
वो जो नहीं चाहते थे युद्ध
बँट रही थी दुनिया
इन दो के बीच

दृश्य अपनी भयानकता के साथ
किसी चलचित्र की तरह नहीं
पृथ्वी के वक्ष पर चल रहा था

झुलस रही मानवता के बीच
कराहें थी स्त्री, पुरुष और बच्चों की
जिन पर अनचाहे ही थोपा गया था
ये सब।

जिन्हें मारा गया था उत्सव मनाते हुए
और उन्हें भी जो जीना चाहते थे
प्यार करते हुए

दुनिया के बड़े-बड़े नेता
अपने-अपने पक्ष में गढ़ रहे थे तर्क
झुलस गई थीं फसलें
फूलों ने इंकार कर दिया था खिलने से
गिरती मिसाइलों और चीखों के बीच
बच्चा अचंभित था
बड़ों का ये कौन-सा खेल है
और इस में जीत कैसी होगी।

- राजेश अरोड़ा
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

बुधवार, 18 सितंबर 2024

एक प्रश्न

कवि!
यदि समूचा विश्व
दो भागों में बँट जाए
एक भाग लुटेरों का
एक भाग भिखारियों का
तो कहाँ रहोगे तुम

- राजेश अरोड़ा 
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद