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शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

मैं अब घर जाना चाहता हूँ

मैं अब हो गया हूँ निढाल
अर्थहीन कार्यों में
नष्ट कर दिए
मैंने
साल-पर-साल
न जाने कितने साल!
और अब भी
मैं नहीं जान पाया
है कहाँ मेरा योग?

मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं जंगलों
पहाड़ों में
खो जाना चाहता हूँ
मैं महुए के
वन में

एक कंडे-सा
सुलगना, गुंगुवाना
धुंधुवाना
चाहता हूँ।

मैं जीना चाहता हूँ
और जीवन को
भासमान
करना चाहता हूँ।

मैं कपास धुनना चाहता हूँ
या
फावड़ा उठाना
चाहता हूँ
या
गारे पर ईंटें
बिठाना
चाहता हूँ
या पत्थरी नदी के एक ढोंके पर
जाकर
बैठ जाना
चाहता हूँ
मैं जंगलों के साथ
सुगबुगाना चाहता हूँ
और शहरों के साथ
चिलचिलाना
चाहता हूँ

मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं विवाह करना चाहता हूँ
और
उसे प्यार
करना चाहता हूँ
मैं उसका पति
उसका प्रेमी
और
उसका सर्वस्व
उसे देना चाहता हूँ
और
उसकी गोद
भरना चाहता हूँ।

मैं अपने आसपास
अपना एक लोक
रचना चाहता हूँ।
मैं उसका पति, उसका प्रेमी
और
उसका सर्वस्व
उसे देना चाहता हूँ
और
पठार
ओढ़ लेना
चाहता हूँ।

मैं समूचा आकाश
इस भुजा पर
ताबीज़ की तरह
बांध लेना चाहता हूँ।

मैं महुए के बन में
एक कंडे-सा
सुलगना, गुंगुवाना
धुंधुवाना चाहता हूँ।

मैं अब घर
जाना चाहता हूँ।

- श्रीकांत वर्मा
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अनूप भार्गव की पसंद 

रविवार, 8 दिसंबर 2024

एक और ढंग

भागकर अकेलेपन से अपने
तुममें मैं गया।

सुविधा के कई वर्ष
तुममें व्यतीत किए।
कैसे?
कुछ स्मरण नहीं।

मैं और तुम! 
अपनी दिनचर्या के पृष्ठ पर 
अंकित थे
एक संयुक्ताक्षर!

क्या कहूँ! लिपि की नियति
केवल लिपि की नियति थी

तुममें से होकर भी,
बसकर भी,
संग-संग रहकर भी
बिल्कुल असंग हूँ।

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है।
लेकिन! 
क्यों लगता है मुझे
प्रेम
अकेले होने का ही
एक और ढंग है।

- श्रीकांत वर्मा
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संपादकीय चयन 

सोमवार, 10 जून 2024

मैं

मैं एक भागता हुआ दिन हूँ 
और रुकती हुई रात
मैं नहीं जानता हूँ 
मैं ढूँढ़ रहा हूँ अपनी शाम 
या ढूँढ़ रहा हूँ अपना प्रात!

- श्रीकांत वर्मा
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संपादकीय चयन 

रविवार, 10 सितंबर 2023

कलिंग

केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं
केवल अशोक सिर झुकाए हुए है
और सब
विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल अशोक के कानों में चीख़
गूँज रही है
और सब
हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल अशोक ने शस्त्र रख दिए हैं
केवल अशोक
लड़ रहा था। 

- श्रीकांत वर्मा।
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कुमार अनुपम की पसंद 

सोमवार, 14 अगस्त 2023

कोसल में विचारों की कमी है


महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो!
युद्ध नहीं हुआ -
लौट गए शत्रु।
वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी।
कोई कसर न थी।
युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता।
न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व
न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था!
निहत्थे थे वे।
उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है!
जो भी हो
जय यह आपकी है।
बधाई हो!
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए -
वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं
जैसे कि यह -
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है।
- श्रीकांत वर्मा
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कुमार अनुपम की पसंद