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शनिवार, 12 जुलाई 2025

इसी काया में मोक्ष

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
इसी से तो मिलना था
पिछले कई जन्मों से।

एक ऐसा आदमी जिसे पाकर
यह देह रोज़ ही जन्मे, रोज़ ही मरे
झरे हरसिंगार की तरह
जिसे पाकर मन
फूलकर कुप्पा हो जाए।

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
अगर पूरी दुनिया अपनी आँखों नहीं देखी
तो भी यह जन्म व्यर्थ नहीं गया।

बहुत दिनों से मैं
किसी को अपना कलेजा
निकालकर दे देना चाहता हूँ
मुद्दतों से मेरे सीने में
भर गया है अपार मर्म
मैं चाहता हूँ कोई
मेरे पास भूखे शिशु की तरह आए
कोई मथ डाले मेरे भीतर का समुद्र
और निकाल ले सारे रतन।

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही
भक्क से बर जाए आँखों में लौ
और लगे कि दीया लेकर खोजने पर ही
मिलेगा धरती पर ऐसा मनुष्य
कि पा गया मैं उसे
जिसे मेरे पुरखे गंगा में नहाकर पाते थे।

बहुत दिनों से मैं
जानना चाहता हूँ
कैसा होता है मन की सुंदरता का मानसरोवर
छूना चाहता हूँ तन की सुंदरता का शिखर
मैं चाहता हूँ मिले कोई ऐसा
जिससे मन हज़ार बहानों से मिलना चाहे।

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
करोड़ों जन्मों के पाप मिट गए
कट गए सारे बंधन
कि मोक्ष मिल गया इसी काया में।

- दिनेश कुशवाह
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विजया सती की पसंद 

शुक्रवार, 27 जून 2025

डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी का खाना

जिस चाव से विश्वनाथ जी खाते हैं पकवान
उसी चाव से खाते हैं नमक और रोटी
प्याज और मिर्च के साथ
चटनी देखते ही उनका चोला मगन हो जाता है ।

इस तरह कि उन्हें खाता हुआ देखकर
कुबेर के मुँह में पानी आ जाए
डॉक्टर अपनी हिदायतें भूल जाएँ
मंदाग्नि के रोगी की भूख खुल जाए
कुछ ऐसा कि उन्हें खिलाने वाला
उन्हें खाता हुआ देखकर ही अघा जाए ।
मुँह में एक निवाला गया नहीं कि बस
सिर हिला हौले से ‘वाह’
जैसे किसी ने बहुत सलीके से उन्हें
ग़ालिब का कोई शेर सुना दिया हो।
थाली का एक-एक चावल अँगुलियों से
उठाते हैं अक्षत की तरह
हाथ से खाते हैं भात
जैसे चम्मच से चावल खाना
मध्यस्थ के माध्यम से प्रेमिका का चुंबन लेना हो।

रस की उद्भावना में डूबे भरत से
कविता के अध्यापक विश्वनाथ जी ने
सीखा होगा शायद बातों-बातों में भी
व्यंजनों का रस लेना।

रोटी-दाल-भात-तरकारी
पूरी-पराठा-रायता-चटनी
दही बड़े और भरवा बैंगन
इडली-डोसा-चाट-समोसा
ज़रा इनका उच्चारण तो कीजिए
आप भी आदमी हो जाएँगे।

अगर अन्न-जल, भूख-प्यास न होते
तो कितनी उबाऊ होती यह दुनिया
अगर दुनिया में खाने-पीने की चीज़ें न होतीं
तो जीभ को राम कहने में भी रस नहीं मिलता।

विश्वनाथ जी का खाना देखकर मन करता है कि
आज बीवी से कहें कि वह
मटर का निमोना और आलू का चोखा बनाए 
जिसे खाया जा सके छककर।

बाबा किसी ग़रीब बाभन के बेटे रहे होंगे
अन्यथा अमीरी में पले हुए
किसी भी आदमी की जीभ पर
नहीं चढ़ सकता अन्नमात्र का ऐसा स्वाद
उनके खाने की तुलना ग़रीब मजूर या
हलवाहे की, खेत पर खुलने वाली
भूख से ही की जा सकती है।

अन्यथा जिनके पास विकल्प हैं स्वाद के
वे नहीं जानते भूख का स्वाद।

- दिनेश कुशवाह
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

मंगलवार, 24 जून 2025

कम नहीं हुआ है किसी पर मरने का मूल्य

बहुत छोटी हो गई है हमारी दुनिया
बहुत कम हुई है हमारी दुनिया की दूरी
पर हमारा भय कम नहीं हुआ है।

अलंघ्य कुछ भी नहीं है हमारी दुनिया में आज
पर वहीं की वहीं खड़ी है दो कमरों के बीच
दीवार दुर्भेद्य
जिसे दो जन हटाना चाहते हैं पूरे मन से
जबकि अभी-अभी गिरी है बर्लिन की दीवार।

देशों ने चखा है स्वतंत्रता का स्वाद
पर हमारे मुँह का कसैलापन कम नहीं हुआ है।

आँखों का कोना सहलाने जितनी मुलायमियत से
छूते ही कुछ बटनें
एक आदमी बोलता है हैलो
सात समुंदर पार
पर उस आदमी के लिए
हमारा तरसना कम नहीं हुआ।

आपसी बातचीत बढ़ी है दुनिया में
पर कम नहीं हुए हैं प्रश्न
दुनिया में आदान-प्रदान बढ़ा है
पर कम नहीं हुए हैं युद्ध।
युद्ध के सारे हथियार बदले हैं
पर एक चीज़ बिलकुल नहीं बदली
कि युद्ध में अब भी मरता है आदमी।

मारने की दर बढ़ी है दुनिया में
पर
कम नहीं हुआ है किसी पर मरने का मूल्य।

- दिनेश कुशवाह
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

खजुराहो में मूर्तियों के पयोधर

पत्थरों में कचनार के फूल खिले हैं 
इनकी तरफ़ देखते ही आँखों में
रंग छा जाते हैं
मानो ये चंचल नैन
इन्हें जनमों से जानते थे।

मानो हृदय ही फूला-फला है
अपनी सारी उदारता के साथ
काया के ऊपर
डाल पर पके बेल की आभा और गंध लेकर

एक मद्धम सुनहरी आँच
फूटती है इनके चतुर्दिक
जैसे भोर के सुरमई संसार में
दिन निकलने से ठीक पहले
दिखता है लालटेन का प्रकाश वृत।

सम्मोहन से सुचिक्कन ये कांति के कोहिनूर
दीप रहे हैं हज़ार वर्षों से
ताम्बई दीपाधारों पर फूट पड़ने को तत्पर
प्रथम सद्यः प्रसूता के स्तनों जैसे
उन्नत-उज्ज्वल और वर्तुल।

मनुष्य का सबसे मुलायम अनुभव
छेनी और हथौड़ियों से तराशा गया है
जैसे बलखाती नदी का जल
हौले-हौले गढ़ता है शालिग्राम
कलेजे से लगाकर शिलाखंड।

कलाकार हाथों ने पत्थरों में जड़ दिए हैं
नवनीत के बड़े-बड़े लोने
कि वे सदा वैसे ही बने रहें
न ढलें, न गलें
प्रगाढ़ आलिंगनों से अक्षत
इतने उदग्र ऐसे उद्धत
जैसे संसार भर में बनने वाली रंग-बिरंगी चोलियाँ
पाँव पोंछने के लिए हों।

इन्हें देखकर मन करता है
कहीं से कटोरा-भर केसर घोल लाऊँ
और धीरे-धीरे करूँ इन पर लेप
जैसे ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया जाता है
मनुहार कर किसी को ले चलूँ अपने संग
खूब आदर-सत्कार करूँ और पूछूँ
इन मंगलघटों में बसे
मनुष्य के प्राणों का रहस्य।

जिन दिनों आधी-आधी रात तक
चलती है पुरवाई
अमराइयों में अलसाई कोयल
बोलती है कुहु-कुहु
नारंगी का यह मदन-रस-माता बाग
अपनी आती-जाती हर सांस के साथ डोलता है।

मौसम की पहली बारिश के बाद
तत्क्षण जब निकलती है धूप
घटा और घाम में एक साथ नहाए
वक्षों से उठते हैं वाष्प के फाहे
माघ की सुबह मुँह से निकली भाप की तरह
जैसे किसी सद्यः स्नाता की देह से
उठती हो निशब्द कामनाओं की लौ।

एक सखी दूसरी से कहती है
सखी! अपने ये फूल देख रही हो
नंदन वन का पारिजात भी
इनके आगे कुछ नहीं है
जब तुम कुएं में पानी भरने जाओगी
तो धरती के ये फूल गेंदें 
पाताल तक महकेंगे।

इस पर्वत उपत्यका में कभी
मृगछौने के पीछे दौड़कर देखो
ललछौंही आँखों वाले ये खरगोश
अपनी जगह उछल-कूद की
कैसी प्रीतिकर युगलबंदी करते हैं।

सजते सँवरते समय ये किसी व्याकुल छैला की तरह
उचक-उचककर आईने में झाँकते हैं
तब मन करता है प्रिय की पठायी मुंदरी की तरह
इन्हें हाथ में लेकर हियरा भर देखूँ।

गोमुख से निकली गंगा की तरह
कंचनजंघा के इन सुनहरे शिखरों से भी
फूटती है एक गंगोत्री जिससे यह सारी धरती
दूधो नहा और पूतों फल रही है।

- दिनेश कुशवाह।
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कुमार अनुपम की पसंद