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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

मेरा आँगन, मेरा पेड़

मेरा आँगन
कितना कुशादा कितना बड़ा था
जिसमें
मेरे सारे खेल
समा जाते थे
और आँगन के आगे था वह पेड़
कि जो मुझसे काफ़ी ऊँचा था
लेकिन
मुझको इसका यक़ीं था
जब मैं बड़ा हो जाऊँगा
इस पेड़ की फुनगी भी छू लूँगा
बरसों बाद
मैं घर लौटा हूँ
देख रहा हूँ
ये आँगन
कितना छोटा है
पेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है

-  जावेद अख़्तर
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

रविवार, 29 सितंबर 2024

आप भी आइए

आप भी आइए हमको भी बुलाते रहिए
दोस्‍ती जुर्म नहीं दोस्‍त बनाते रहिए।

ज़हर पी जाइए और बाँटिए अमृत सबको
ज़ख्‍म भी खाइए और गीत भी गाते रहिए।

वक़्त ने लूट लीं लोगों की तमन्‍नाएँ भी,
ख़्वाब जो देखिए औरों को दिखाते रहिए।

शक्‍ल तो आपके भी ज़हन में होगी कोई,
कभी बन जाएगी तसवीर बनाते रहिए।

- जावेद अख़्तर
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

रविवार, 26 नवंबर 2023

ये खेल क्या है?

मिरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है 
और अब 
मेरी चाल के इंतज़ार में है 
मगर मैं कब से 
सफ़ेद ख़ानों 
सियाह ख़ानों में रक्खे 
काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ 
मैं सोचता हूँ 
ये मोहरे क्या हैं

अगर मैं समझूँ 
कि ये जो मोहरे हैं 
सिर्फ लकड़ी के हैं खिलौने 
तो जीतना क्या है हारना क्या 
न ये ज़रूरी 
न वो अहम है 
अगर ख़ुशी है न जीतने की 
न हारने का ही कोई ग़म है

तो खेल क्या है
मैं सोचता हूँ
जो खेलना है
तो अपने दिल में यकीन कर लूँ
ये मोहरे सचमुच के बादशाहो-वज़ीर
सचमुच के हैं प्यादे 
और इनके आगे है
दुश्मनों की वो फ़ौज
रखती है जो कि मुझको तबाह करने के
सारे मनसूबे
सब इरादे
मगर मैं ऐसा जो मान भी लूँ
तो सोचता हूँ
ये खेल कब है
ये जंग है जिसको जीतना है
ये जंग है जिसमें सब है जायज़ 
कोई ये कहता है जैसे मुझसे 
ये जंग भी है
ये खेल भी है
ये जंग है पर खिलाड़ियों की 
ये खेल है जंग की तरह का 
मैं सोचता हूँ
जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
कि कोई मोहरा रहे कि जाए

मगर जो है बादशाह 
उस पर कभी कोई आँच भी न आए 
वज़ीर ही को है बस इजाज़त 
कि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए

मैं सोचता हूँ 
जो खेल है 
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है 
प्यादा जो अपने घर से निकले 
पलट के वापस न जाने पाए 
मैं सोचता हूँ 
अगर यही है उसूल 
तो फिर उसूल क्या है 
अगर यही है ये खेल 
तो फिर ये खेल क्या है 
मैं इन सवालों से जाने कब से उलझ रहा हूँ 
मिरे मुखालिफ ने चाल चल दी है 
और अब मेरी चाल के इंतज़ार में है

- जावेद अख़्तर।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

वो कमरा याद आता है

मैं जब भी
ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तपकर
मैं जब भी 
दूसरों के और अपने झूठ से थककर 
मैं सबसे लड़ के ख़ुद से हार के 
जब भी उस इक कमरे में जाता था 
वो हलके और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा 
वो बेहद मेहरबाँ कमरा 
जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था 
जैसे कोई माँ 
बच्चे को आँचल में छुपा ले
प्यार से डाँटे 
ये क्या आदत है 
जलती दोपहर में मारे-मारे घूमते हो तुम 
वो कमरा याद आता है 
दबीज़ और ख़ासा भारी 
कुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला 
वो शीशम का दरवाज़ा 
कि जैसे कोई अक्खड़ बाप
अपने खुरदुरे सीने में

शफ़्क़त के समंदर को छुपाये हो 
वो कुर्सी 
और उसके साथ वो जुड़वाँ बहन उसकी 
वो दोनों 
दोस्त थीं मेरी 
वो इक गुस्ताख़ मुँहफट आईना 
जो दिल का अच्छा था 
वो बेहंगम सी अलमारी 
जो कोने में खड़ी 
इक बूढ़ी अन्ना की तरह 
आईने को तन्बीह करती थी 
वो इक गुलदान 
नन्हा-सा 
बहुत शैतान 
उन दोनों पे हँसता था 
दरीचा 
या ज़हानत से भरी इक मुस्कुराहट 
और दरीचे पर झुकी वो बेल 
कोई सब्ज़ सरगोशी 
किताबें 
ताक़ में और शेल्फ़ पर
संजीदा उस्तानी बनी बैठीं 
मगर सब मुंतज़िर इस बात की 
मैं उनसे कुछ पूछूँ
सिरहाने

नींद का साथी
थकन का चारागर
वो नर्म-दिल तकिया
मैं जिसकी गोद में सर रखके 
छत को देखता था 
छत की कड़ियों में 
न जाने कितने अफ़सानों की कड़ियाँ थीं 
वो छोटी मेज़ पर 
और सामने दीवार पर 
आवेज़ाँ तस्वीरें 
मुझे अपनाईयत से और यक़ीं से देखतीं थीं 
मुस्कुराती थीं 
उन्हें शक भी नहीं था 
एक दिन 
मैं उनको ऐसे छोड़ जाऊँगा 
मैं इक दिन यूँ भी जाऊँगा
कि फिर वापस न आऊँगा
मैं अब जिस घर में रहता हूँ 
बहुत ही ख़ूबसूरत है 
मगर अकसर यहाँ ख़ामोश बैठा याद करता हूँ 
वो कमरा बात करता था

- जावेद अख़्तर।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल

हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे

थीं सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे

ख़ुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे

ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं
उन दिनों हमने फ़ाके झेले थे।

- जावेद अख़्तर।
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बिनीता सहाय की पसंद