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गुरुवार, 15 मई 2025

धब्बे और तसवीर

                                                                                                                                                        वह चित्र भी झूठा नहीं :
तब प्रेम बचपन ही सही
संसार ही जब खेल था,
तब दर्द था सागर नहीं,
लहरों बसा उद्वेल था;
पर रंग वह छूटा नहीं :
उस प्यार में कुंठा न थी
तुम आग जिसमें भर गए,
तुम वह जहाँ कटुता न थी
उस खेल में छल कर गए;
मैं हँस दिया, रूठा नहीं :
उस चोट के अन्दाज़ में
जो मिल गया, अपवाद था,
उस तिलमिलाती जाग में,
जो मिट गया, उन्माद था,
जो रह गया, टूटा नहीं :
अभाव के प्रतिरूप ही
संसृति नया वैभव बनी,
हर दर्द के अनुरूप ही
सागर बना, गागर बनी,
कच्ची तरह फूटा नहीं :
खोकर हृदय उससेअधिक
कुछ आत्मा ने पा लिया,
विक्षोभ को सौन्दर्य कर
संसार पर बिखरा दिया :
दे ही गया, लूटा नहीं ।

 
-कुँवर नारायण
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- हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

गुरुवार, 22 अगस्त 2024

यक़ीनों की ज़ल्दबाज़ी से

एक बार ख़बर उड़ी
कि कविता अब कविता नहीं रही 
और यूँ फैली
कि कविता अब नहीं रही!

यक़ीन करने वालों ने यक़ीन कर लिया 
कि कविता मर गई 
लेकिन शक करने वालों ने शक किया 
कि ऐसा हो ही नहीं सकता 
और इस तरह बच गई कविता की जान

ऐसा पहली बार नहीं हुआ 
कि यक़ीनों की जल्दबाज़ी से 
महज़ एक शक ने बचा लिया हो 
किसी बेगुनाह को।

- कुँवर नारायण
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संपादकीय चयन 

सोमवार, 27 मई 2024

घंटी

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदलकर सो गया

दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदलकर सो गया

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदलकर सो गया

एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ाकर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..

मौत ने कहा-
करवट बदलकर सो जाओ।

- कुँवर नारायण
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से

शनिवार, 4 मई 2024

कमरे में धूप

हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही,
दीवारें सुनती रहीं।
धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।
सहसा किसी बात पर बिगड़कर
हवा ने दरवाज़े को तड़ से
एक थप्पड़ जड़ दिया!
खिड़कियाँ गरज उठीं,
अख़बार उठकर खड़ा हो गया,
किताबें मुँह बाये देखती रहीं,
पानी से भरी सुराही फर्श पर टूट पड़ी,
मेज़ के हाथ से क़लम छूट पड़ी।

धूप उठी और बिना कुछ कहे
कमरे से बाहर चली गई।
शाम को लौटी तो देखा
एक कुहराम के बाद घर में ख़ामोशी थी।
अँगड़ाई लेकर पलँग पर पड़ गई,
पड़े-पड़े कुछ सोचती रही,
सोचते-सोचते न जाने कब सो गई,
आँख खुली तो देखा सुबह हो गई।

- कुँवर नारायण।
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संपादकीय चयन 

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

चक्रव्यूह

युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर 
जो हज़ारों बार दुहराई गई, 
रक्त की विरुदावली कुछ और रंगकर 
लोरियों के संग जो गाई गई
उसी इतिहास की स्मृति, 
उसी संसार में लौटे हुए, 
ओ योद्धा, तुम कौन हो? 

मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ 
प्रारब्ध जिसका गर्भ ही से हो चुका निश्चित
अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह में फेंका हुआ उन्माद
बाँधी पंक्तियों को तोड़ 
क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ जयनाद 
मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया
पिघलती आग-सी संध्या
बदन पर एक फूटा कवच
सारी देह क्षत-विक्षत
धरती-ख़ून में ज्यों सनी लथपथ लाश
सिर पर गिद्ध-सा मँडरा रहा आकाश

मैं बलिदान इस संघर्ष में 
कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर 
जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया
आहूत हर युद्धाग्नि में 
वह जीव हूँ निष्पाप 
जिसको पूज कर मारा गया
वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा
वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा। 

यह महासंग्राम
युग-युग से चला आता महाभारत
हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में
छिपा वह पृष्ठ मेरा है 
जहाँ सदियों पुराना व्यूह, जो दुर्भद्य था, टूटा
जहाँ अभिमन्यु कोई भयों के आतंक से छूटा 
जहाँ उसने विजय के चंद घातक पलों में जाना 
कि छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं, 
जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना
जहाँ तक पहुँच उसने मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे में 
घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना।

- कुँवर नारायण।
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संपादकीय चयन 

गुरुवार, 18 जनवरी 2024

नई किताबें

नई-नई किताबें पहले तो
दूर से देखती हैं
मुझे शरमाती हुईं

फिर संकोच छोड़कर
बैठ जाती हैं फैलकर
मेरे सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर

उनसे पहला परिचय... स्पर्श
हाथ मिलाने जैसी रोमांचक
एक शुरुआत...

धीरे-धीरे खुलती हैं वे
पृष्ठ दर पृष्ठ
घनिष्ठतर निकटता
कुछ से मित्रता
कुछ से गहरी मित्रता
कुछ अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को
कुछ मेरे चिंतन की अंग बन जातीं
कुछ पूरे परिवार की पसंद
ज़्यादातर ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता

फिर भी
अपने लिए हमेशा खोजता रहता हूँ
किताबों की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोड़ी अल्हड़-चुलबुली-सुंदर
आत्मीय किताब
जिसके सामने मैं भी खुल सकूँ
एक किताब की तरह पन्ना-पन्ना
और वह मुझे भी
प्यार से मन लगा कर पढ़े...

 - कुँवर नारायण।
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संपादकीय चयन 

बुधवार, 3 जनवरी 2024

दीवारें

अब मैं एक छोटे-से घर
और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ

कभी मैं एक बहुत बड़े घर
और छोटी-सी दुनिया में रहता था

कम दीवारों से
बड़ा फ़र्क पड़ता है

दीवारें न हों
तो दुनिया से भी बड़ा हो जाता है घर।

- कुँवर नारायण।
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संपादकीय चयन 

बुधवार, 6 सितंबर 2023

संभावनाएँ

लगभग मान ही चुका था मैं 
मृत्यु के अंतिम तर्क को 
कि तुम आए 
और कुछ इस तरह रखा 
फैलाकर 
जीवन के जादू का 
भोला-सा इंद्रजाल 
कि लगा यह प्रस्ताव 
ज़रूर सफल होगा।

ग़लतियाँ ही ग़लतियाँ थी उसमें 
हिसाब-किताब की, 
फिर भी लगा 
गलियाँ ही गलियाँ हैं उसमें 
अनेक संभावनाओं की 
बस, हाथ भर की दूरी पर है, 
वह जिसे पाना है। 
ग़लती उसी दूरी को समझने में थी।

- कुँवर नारायण।

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संपादकीय पसंद 

गुरुवार, 24 अगस्त 2023

अबकी बार लौटा तो

अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूँगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बाँधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूँगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से

अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा
घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह-बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं
अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूँगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा

- कुँवर नारायण।

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अनूप भार्गव की पसंद

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

बात सीधी थी पर

बात सीधी थी पर एक बार

भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई।

उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-

लेकिन इससे भाषा के साथ-साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्योंकि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह!

आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था -
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।

हारकर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।

ऊपर से ठीक-ठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देखकर पूछा -
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”

- कुँवर नारायण।

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अनूप भार्गव की पसंद।