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शनिवार, 24 मई 2025

चेतन जड़

प्यास कुछ और बढ़ी
और बढ़ी ।
बेल कुछ और चढ़ी
और चढ़ी ।
प्यास बढ़ती ही गई,
बेल चढ़ती ही गई ।
कहाँ तक जाओगी बेलरानी
पानी ऊपर कहाँ है ?
जड़ से आवाज़ आई--
यहाँ है, यहाँ है ।

-अशोक चक्रधर 

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- हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

गुरुवार, 8 मई 2025

चेतन जड़

                                                                                                                                                                           प्यास कुछ और बढ़ी
और बढ़ी ।
बेल कुछ और चढ़ी
और चढ़ी ।
प्यास बढ़ती ही गई,
बेल चढ़ती ही गई ।
कहाँ तक जाओगी बेलरानी
पानी ऊपर कहाँ है ?
जड़ से आवाज़ आई--
यहाँ है, यहाँ है।

- अशोक चक्रधर 

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- हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

 

 

सोमवार, 13 नवंबर 2023

नेता जी लगे मुस्कुराने

एक महाविद्यालय में
नए विभाग के लिए
नया भवन बनवाया गया,
उसके उद्घाटनार्थ
विद्यालय के एक पुराने छात्र
लेकिन नए नेता को
बुलवाया गया।

अध्यापकों ने
कार के दरवाज़े खोले
नेती जी उतरते ही बोले -
यहाँ तर गईं
कितनी ही पीढ़ियाँ,
अहा!
वही पुरानी सीढ़ियाँ!
वही मैदान
वही पुराने वृक्ष,
वही कार्यालय
वही पुराने कक्ष।
वही पुरानी खिड़की
वही जाली,
अहा, देखिए
वही पुराना माली।
मंडरा रहे थे
यादों के धुंधलके
थोड़ा और आगे गए चल के -
वही पुरानी
चिमगादड़ों की साउंड,
वही घंटा
वही पुराना प्लेग्राउंड।
छात्रों में
वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी।
नमस्कार, नमस्कार!
अब आया हॉस्टल का द्वार -
हॉस्टल में वही कमरे
वही पुराना ख़ानसामा,
वही धमाचौकड़ी
वही पुराना हंगामा।

नेता जी पर
पुरानी स्मृतियाँ छा रही थीं,
तभी पाया
कि एक कमरे से
कुछ ज़्यादा ही
आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया,
लड़के ने खोला
पर घबराया।
क्योंकि अंदर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी।
दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के -
आइए सर!
मेरा नाम मदन है,
इससे मिलिए
मेरी कज़न है।

नेता जी लगे मुस्कुराने
वही पुराने बहाने

- अशोक चक्रधर।
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विजया सती के सौजन्य से 

बुधवार, 8 नवंबर 2023

तुम से आप

तुम भी जल थे
हम भी जल थे
इतने घुले-मिले थे
कि एक-दूसरे से
जलते न थे।

न तुम खल थे
न हम खल थे
इतने खुले-खुले थे
कि एक दूसरे को
खलते न थे।

अचानक हम तुम्हें खलने लगे,
तो तुम हमसे जलने लगे।
तुम जल से भाप हो गए
और 'तुम' से 'आप' हो गए।

- अशोक चक्रधर।
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विजया सती की पसंद