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रविवार, 9 फ़रवरी 2025

आखर-आखर गान धरा का

साधो! 
तुमने सुना नहीं क्या 
हर पल चलता आखर-आखर गान धरा का 

भोर हुए पंछी 
उजास का गीत सुनाते
जन्म धूप का जब होता 
वे सोहर गाते 
पूरे दिन 
होता रहता है 
धूप-छाँव में भीतर-बाहर गान धरा का 

हवा नाचती 
पत्ते देते ताल साथ में 
दिन-बीते तक 
बच्चे हँसते बात-बात में 
मेघ गरजते 
बरखा होती 
मेंढक गाते रात-रात भर गान धरा का 

रोज़ आरती होती वन में 
साँझ-सकारे 
अनहद नाद सुनाते गुपचुप 
चाँद-सितारे 
दिन बर्फ़ीले भी 
आते हैं 
और तभी होता है पतझर-गान धरा का

- कुमार रवीन्द्र 
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शनिवार, 21 सितंबर 2024

काश हम पगडंडियाँ होते

यों न होते
काश!
हम पगडंडियाँ होते

इधर जंगल, उधर जंगल
बीच में हम साँस लेते
नदी जब होती अकेली
उसे भी हम साथ देते

कभी उसकी
देह छूते
कभी अपने पाँव धोते

कोई परबतिया
इधर से जब गुज़रती
घुँघरुओं की झनक
भीतर तक उतरती

हम
उसी झँकार को
आदिम गुफ़ाओं में सँजोते

और भी पगडंडियों से
उमग कर हम गले मिलते
तितलियों के संग उड़ते
कोंपलों के संग खिलते

देखते हम
कहाँ जाती है गिलहरी
कहाँ बसते रात तोते

- कुमार रवीन्द्र
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