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गुरुवार, 29 मई 2025

सफ़र पर


यह वक्त शब्दों के दीये जलाने का है
कहा एक कवि ने
और मैंने सचमुच एक दीया जलाकर
आँगन में रख दिया
वह लड़ता रहा अंधेरे से
लड़ता रहा आँधियों से
लड़ता रहा एक पूरी रुत से
और धीरे-धीरे
मेरे जिस्म में एकाकार हो गया
अब मेरे हर शब्द में है एक मशाल
और शब्द निकले हैं सफ़र पर।

- गुरमीत बेदी

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-हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

सफ़र पर

यह वक्त शब्दों के दीए जलाने का है
कहा एक कवि ने
और मैंने सचमुच एक दीया जलाकर
आँगन में रख दिया

वह लड़ता रहा अँधेरे से
लड़ता रहा आँधियों से
लड़ता रहा एक पूरी रुत से
और धीरे-धीरे
मेरे जिस्म में एकाकार हो गया

अब मेरे हर शब्द में है एक मशाल
और शब्द निकले हैं सफ़र पर।

- गुरमीत बेदी
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

मंगलवार, 21 जनवरी 2025

अपने भीतर

धूप की शरारत के बावजूद

जैसे धरती बचाकर रखती है

थोड़ी-सी नमी अपने भीतर

पहाड़ बचाकर रखते हैं

कोई हरा कोना अपने वक्ष में

तालाब बचाकर रखता है

कोई एक बूँद अपनी हथेली में

पेड़ बचाकर रखते हैं 

टहनियों और पत्तों के लिए जीवन रस

फूल बचाकर रखते हैं 

खुशबू अपने आवरण में

चिड़िया बचाकर रखती है

मौसम से जूझने की जिजीविषा


वैसे ही मैंने बचाकर रखा है

अपने भीतर

तुम्हारे होने का अहसास।


- गुरमीत बेदी

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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से