सर्वेश्वरदयाल सक्सेना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

जड़ें

जड़ें कितनी गहरीं हैं
आँकोगी कैसे?
फूल से?
फल से?
छाया से?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है,
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।

जलहीन, सूखी, पथरीली,
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
--------------------------

हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

बुधवार, 24 जनवरी 2024

तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर 
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है 
कि दिशाएँ पास आ गई हैं, 
हर रास्ता छोटा हो गया है, 
दुनिया सिमटकर 
एक आँगन-सी बन गई है 
जो खचाखच भरा है, 
कहीं भी एकांत नहीं 
न बाहर, न भीतर। 

हर चीज़ का आकार घट गया है
पेड़ इतने छोटे हो गए हैं 
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख 
आशीष दे सकता हूँ
आकाश छाती से टकराता है
मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ। 

तुम्हारे साथ रहकर 
अक्सर मुझे महसूस हुआ है 
कि हर बात का एक मतलब होता है
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी
हवा का खिड़की से आने का
और धूप का दीवार पर 
चढ़कर चले जाने का। 

तुम्हारे साथ रहकर 
अक्सर मुझे लगा है 
कि हम असमर्थताओं से नहीं 
संभावनाओं से घिरे हैं
हर दीवार में द्वार बन सकता है 
और हर द्वार से पूरा का पूरा 
पहाड़ गुज़र सकता है। 

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है
भुजाएँ अगर छोटी हैं
तो सागर भी सिमटा हुआ है
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है, 
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है 
वह नियति की नहीं मेरी है।

- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
-------------------------

संपादकीय चयन