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रविवार, 8 जून 2025

वृक्ष विहीन

वृक्ष विहीन हुई जाती थी धरती
लालच की आँत फैलती जाती थी

ऐसे में देखा मैंने 
मेरे घर के गमले में
नन्हा-सा पीपल एक उगा है
दस-ग्यारह पत्ते फूटे हैं उस पर
लहराते हैं

शायद कोई पांखी 
खाकर गोल
उड़ते-उड़ते बीज यहाँ पर डाल गया था
पड़ा हुआ था जो मिट्टी में दबा हुआ था

पाकर परस हवा पानी का
उग आया है

मैंने सोचा
मैं इसको रोपूँगा घर के सम्मुख
सींचूँगा बाड़ करूँगा 
जिस पर पांखी आऐंगें

वृक्ष काटने वाले निशदिन जुटे हुए हैं बेशक 
लेकिन 
नन्हीं गुरगुल गौरैया टुइयाँ तोता
भी तो भरसक जुटे हुए हैं

विनोद पदरज
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विजया सती की पसंद 

शुक्रवार, 6 जून 2025

सौंदर्य

हम पहाड़ का सौंदर्य देखते हैं
पहाड़ का दुख नहीं 
हम समुद्र का सौंदर्य देखते हैं 
समुद्र का दुख नहीं 
हम मरुस्थल का सौंदर्य देखते हैं 
मरुस्थल का दुख नहीं 
हम स्त्री का सौंदर्य देखते हैं 
जो पहाड़ है 
समुद्र है 
मरुस्थल है।

- विनोद पदरज
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विजया सती की पसंद 

मंगलवार, 3 जून 2025

बहन


ज्यादा मत हँसा कर

नहीं तो दुख पाऐगी

बरजती थी माँ

छोटी बहन को


अब नहीं हँसती बहन

उस तरह से

जिस तरह से

खिलखिलाती

उड़ रही है भानजी


बल्कि डाँटती है-

"नासपीटी

बंद कर

ज्यादा खिलखिलाएगी तो जीते जी मर जाएगी" और उदास हो जाती है


ना जाने किन स्मृतियों में खो जाती है।


 - विनोद पदरज

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- हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 


गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024

मुकुट

सम्राट एडवर्ड अष्टम ने उतार फेंका था इसे
दरअसल यह
प्रेमिका के साथ सिर जोड़कर बतियाने में आड़े आता था
और प्रेमिका भी
रानी नहीं थी कोई कि पटरानी बनने की चाह में
मुकुट से प्यार करती
साधारण स्त्री थी और सचमुच ही एडवर्ड से प्यार करती थी

बुद्ध और महावीर ने ठोकरों पर उछाल दिया था इसे
वे दुख का कारण जानना चाहते थे
और दुख के कारण का पता
आदमी के पास आदमी की तरह जाने से चलता है

सुनते हैं कि विक्रमादित्य
भटकता था रात-बिरात
गली कूचों मुहल्लों में
अपना मुकुट उतारकर
उसका शासन श्रेष्ठ बताया जाता है

और गाँधी ने तो इसे पहना ही नहीं
उन्हें अपनी आत्मा के गहने इतने प्रिय थे
कि मुकुट धारण करने का खयाल तक हिंसा लगता था
वे इसकी तरफ़ देखकर
एक मासूम बच्चे की तरह मुस्कुराते थे
पूणी कातते थे
चरखा चलाते थे
बकरियों को चारा खिलाते थे

- विनोद पदरज।
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विजया सती के सौजन्य से 

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2024

पत्नी

वह तुमको देखते ही दौड़ती नहीं तुम्हारी तरफ़
न तपाक से चूमती है तुमको
न तुम्हारा हाथ, हाथ में लेकर चलती है
न ऐसे पत्र लिखती है जिसमें आहें और उसांसे हों
वह प्रेमिका नहीं, तुम्हारी पत्नी है
जो तुम्हारे तुम की एवज में तुम्हें आप कहती है 

उसकी बातों में खुद के माता पिता भाई बहन
तुम्हारे माता पिता भाई बहन होते हैं
वह हर बात बच्चों से शुरू करती है और उन्हीं पर खत्म
और तुम्हें लगता है
वह तुम्हें प्यार नहीं करती

पर वह सदैव तुम्हारे भले की कामना करती है
उसकी आत्मा की गहराई में तुम्हारा संगीत बजता है
तुम्हारी अनुपस्थिति में वह सो नहीं पाती
वह अदृश्य हवा है जिसमें तुम साँस लेते हो
वह परिंडे का जल है जिसे तुम पीते हो
वह वाचाल चकाचौंध नहीं धीमा उजास है
वह गरणाती गंध नहीं भीनी सुवास है
वह उच्छल तरंग नहीं मंथर बहाव है
ऊपर-ऊपर ठंडा भीतर गुनगुना 
आह्लादकारी

हाँ, जब कभी वह बहुत ख़ुश होती है और अकेली-तुम्हारे पास
वह तुम्हें बाथ में भरकर चूम लेती है
और तुम उसे हैरत से देखते हो देर तक, अवाक

- विनोद पदरज।
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विजया सती की पसंद 

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

कभी-कभी

कभी-कभी हम बेसबब खुश होते हैं
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर के वृक्ष पर
अनगिन फूल खिले हैं 
तितलियाँ मँडरा रही हैं भँवरे झूम रहे हैं 

कभी-कभी हम बेसबब उदास होते हैं
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर के वृक्ष के
पत्ते झर रहे हैं
और नई तीतियाँ फूट नहीं रही हैं 

कभी-कभी हम बेसबब निराश होते हैं
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर का वृक्ष सूख रहा है 
झकर चल रही है 
धधक रहा है सूर्य 
बचे-खुचे जल को उड़ाता

कभी-कभी हम बेसबब संकल्पित होते हैं
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर के वृक्ष की जड़ें
चट्टानों को पार कर 
गहरे उतर रही हैं 
पाताल में 

कभी-कभी हम बेसबब खुरदुरे होते हैं 
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर के वृक्ष की छाल
कड़ी दर कड़ी हो रही है हर साल 

कभी-कभी हम बेसबब स्निग्घ होते हैं 
समझ नहीं पाते
कि हमारे भीतर के वृक्ष पर आपादमस्तक
बारिशें गिर रही हैं - धीमी, मद्धम ,धारासार 
और भीतर का जल
उससे ताल मिला रहा है 

कभी-कभी हम बेसबब अकेले में हँसते हैं 
समझ नहीं पाते 
कि हमारे भीतर के वृक्ष पर बैठी चिड़ियाँ
आसमान में उड़ रही हैं 
चहचहाती एक साथ

कभी-कभी हम बेसबब शांत होते हैं
समझ नहीं पाते कि
हमारे भीतर के वृक्ष के पात हिल नहीं रहे हैं
चिड़ियाँ स्तब्ध हैं
घुटा है आसमान 
गिलहरियाँ चुप हैं

कभी-कभी हम बेसबब मन ही मन रोते हैं
समझ नहीं पाते
कि हमारे भीतर के वृक्ष पर 
कोई
कुल्हाड़ी से निशान कर गया है
जड़ों में मट्ठा डाल गया है

- विनोद पदरज।
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विजया सती के सौजन्य से 

सोमवार, 4 दिसंबर 2023

एक दिन

अभी हम झींकते है
माँ ऐसी है
माँ वैसी है
पिताजी ऐसा करते हैं
पिताजी वैसा करते हैं

फिर हमीं एक दिन
उसाँस भरेंगे
माँ ऐसी थी
माँ वैसी थी
पिताजी ऐसा करते थे
पिताजी वैसा करते थे 

- विनोद पदरज।
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विजया सती के सौजन्य से