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गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

इसी दो-राहे पर

अब न उन ऊँचे मकानों में क़दम रखूँगा 
मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी 
अपनी नादार मुहब्बत की शिकस्तों के तुफैल
ज़िंदगी पहले भी शर्माई थी झुँझलाई  थी 
और ये अहद किया था कि ब-ईं हाल-ए-तबाह 
अब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊँगा 
किसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगा 
कोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊँगा 
फिर तिरे काँपते होंटों की फ़ुसूँ-कार हँसी 
जाल बुनने लगी बुनती रही बुनती ही रही 
मैं खिंचा तुझ से मगर तू मिरी राहों के लिए 
फूल चुनती रही चुनती रही चुनती ही रही 
बर्फ़ बरसाई मिरे ज़ेहन ओ तसव्वुर ने मगर 
दिल में इक शोला-ए-बे-नाम सा लहरा ही गया 
तेरी चुप-चाप निगाहों को सुलगते पाकर 
मेरी बेज़ार तबीअत को भी प्यार आ ही गया 
अपनी बदली हुई नज़रों के तक़ाज़े न छुपा 
मैं इस अंदाज़ का मफ़्हूम समझ सकता हूँ 
तेरे ज़र-कार दरीचों की बुलंदी की क़सम 
अपने इक़दाम का मक़्सूम समझ सकता हूँ 
अब न उन ऊँचे मकानों में क़दम रखूँगा 
मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी 
इसी सरमाया ओ अफ़्लास के दोराहे पर 
ज़िंदगी पहले भी शर्माई थी झुँझलाई थी

- साहिर लुधियानवी।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद

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नादार - दरिद्र
तुफ़ैल - प्राप्ति
अहद - प्रतिज्ञा 
मफ़्हूम - अर्थ
ज़र-कार दरीचों - आलीशान (समृद्ध) झरोखों
मक़्सूम - अंजाम(भाग्य)
सर्माया - पूँजी
अफ़्लास - ग़रीबी
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रविवार, 22 अक्टूबर 2023

जंग

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का ख़ून है आख़िर 
जंग मशरिक में हो या मग़रिब में
अम्न ए आलम का ख़ून है आख़िर

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है

टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें
कोख धरती की बांझ होती है
फ़तेह का जश्न हो या हार का सोग
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है

जंग तो खुद ही एक मसला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
ख़ून और आग आज बरसेगी
भूख और एहतियाज कल देगी

इसलिए ए शरीफ़  इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आंगन में
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है।

- साहिर लुधियानवी।
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संपादकीय पसंद 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

फ़नकार

मैंने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे 
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ 

आज दुक्कान पे नीलाम उठेगा उनका 
तूने जिन गीतों पे रखी थी मोहब्बत की असास 

आज चाँदी के तराज़ू में तुलेगी हर चीज़ 
मेरे अफ़्कार मिरी शाइरी मेरा एहसास 

जो तिरी ज़ात से मंसूब थे उन गीतों को 
मुफ़लिसी जिंस बनाने पे उतर आई है 

भूक तेरे रुख़-ए-रनगीं के फ़सानों के एवज़ 
चंद अशिया-ए-ज़रूरत की तमन्नाई है 

देख इस अरसा-ए-गह-ए-मेहनत-ओ-सरमाया में 
मेरे नग़्में भी मिरे पास नहीं रह सकते 

तेरे जल्वे किसी ज़रदार की मीरास सही 
तेरे ख़ाके भी मिरे पास नहीं रह सकते 

आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ 
मैंने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे 

- साहिर लुधियानवी।
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असास = नींव
अफ़्कार = विचार 
मंसूब = सम्बद्ध
जिंस = भोग्य वस्तु
अरसा-ए-गह-ए-मेहनत-ओ-सरमाया = मेहनत और पूँजी का रणक्षेत्र 
मीरास = विरासत
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हरप्रीत सिंह की पसंद