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गुरुवार, 6 मार्च 2025

बचपन का घर

जब बचपन के घर से,
माता-पिता के घर से, बाहर चला था
तब ख़याल नहीं आया
कि यह यात्रा एक और घर के लिए है
जो निर्लज्जता के साथ छीन लेगा
मुझसे मेरे बचपन का घर।

यूँ दे जाएगा एक टीस
जिसे लाखों लोग महसूस करते हैं
क्योंकि दुनियादारी होते हुए
रोज़ छूट रहे हैं
लाखों लोगों के
लाखों बचपन के घर।

कितना अजीब है
जो हम खो देते हैं उमर की ढलान पर
वह फिर कभी नहीं लौटता
जैसे देह से प्राण निकल जाने के बाद फिर कुछ नहीं हो पाता
ठीक वैसे ही गुम जाता है बचपन का घर।

माता-पिता, भाई-बहन,
प्यार, झगड़ा, ज़िद, दुलार, सुख
सब चले जाते हैं
किसी ऐसे देश में
जहाँ नहीं जाया जा सकता है
जीवन की हर संभव कोशिश के बाद भी
वहाँ कोई नहीं पहुँच सकता।

ना तो चीज़ों को काटा-छांटा जा सकता है
और ना गुमी चीज़ों को जोड़ा जा सकता है
पूरा दम लगाकर भी
फिर से नहीं बन सकता है, बचपन का घर।

हम सब,
माता-पिता, भाई-बहन,
आज भी कई बार इकट्ठा होते हैं
बचपन के घर में
पर तब वह घर एक नया घर होता है,
वह बचपन का घर नहीं हो पाता है।

- तरुण भटनागर
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संपादकीय चयन 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024

चायवाला

रोज़ सुबह
बिना नागा
वह पहुँच जाता है
नुक्कड़ वाले चौराहे पर बेचने चाय।
दो रूपए वाली उसकी चाय,
भगा देती है,
रात की बची नींद,
नींद का बचा असर
लोगों को तैयार करती है
नए दिन के लिए।

मिटाती है हुड़क,
हुड़क,
जिसकी गिरफ़्त में कई लोग हैं,
उसके सिर्फ़ एक कप के लिए।
बहुतेरों ने अपने रास्ते बदल लिए हैं
वे अब
नुक्कड़ वाले उस चौराहे से
उसकी दुकान से गुज़रते हैं।

बस एक मुट्ठी चेतना के लिए
ज़रा-सी मूर्छा भगाने
घोलने थोड़ी-सी मिठास
भगाने जरा-सी थकान
सोचने नए सिरे से
बैठने साथ-साथ
करने उत्तेजक वार्तालाप 
चलाने फिर से तेज़ कलम
तेज़ी से निबटाने अधूरा काम
सोच की भाल तेज करने
भगाने उबासी, मनहूसियत
हटाने अनचाही धुंध,
  
उसकी दो रूपए की चाय,
बड़े दफ्तर, कचहरी, रेस्ट हाउस 
और भी जाने कहाँ-कहाँ जाती है।
पर उसके पास हिसाब नहीं है
कि
उसने क्या-क्या किया।

वह बस बेचता है,
और शाम को हिसाब कर लेता है
मुट्ठी भर सिक्कों का।

- तरुण भटनागर
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद