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रविवार, 23 फ़रवरी 2025

गजरा बेचने वाली स्त्री

गजरा बेचने वाली स्त्री
गजरा बेच रही है
वह खुद बदसूरत है
लेकिन दूसरे को सुंदर बनाने के लिए
सुंदरता बेच रही है।

गजरा बेचने वाली स्त्री का दिल कोमल है
लेकिन पैर में बिवाइयाँ फटी हैं
उसने गजरे में पिरो रखे हैं अरमान

उसके अरमान
जो फूलों में गजरे की तरह पिरोए हैं
वह खुद गजरा नहीं लगाती
लेकिन दूसरे को गजरा लगाने की
विशेषताएँ बताती हैं

अजीब विडंबना है कि
सुंदरता बेचने वाली इस असुंदर स्त्री के
सपनों में आती हैं
कई-कई गजरे वाली स्त्रियाँ
और इसका उपहास करती हुईं
गुम हो जाती हैं आकाश में
तब गजरों में पिरोए फूल कांटे की तरह
चुभते हैं उसके सीने में!

- निर्मला पुतुल
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संपादकीय चयन 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!

बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना 
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर 
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें 
मत ब्याहना उस देश में 
जहाँ आदमी से ज़्यादा 
ईश्वर बसते हों 
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ 
वहाँ मत कर आना मेरा लगन 
वहाँ तो क़तई नहीं 
जहाँ की सड़कों पर 
मन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँ 
ऊँचे-ऊँचे मकान और 
बड़ी-बड़ी दुकानें 
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता 
जिसमें बड़ा-सा खुला आँगन न हो 
मुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबह 
और शाम पिछवाड़े से जहाँ 
पहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखे 
मत चुनना ऐसा वर 
जो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सर 
काहिल-निकम्मा हो 
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में 
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर 
कोई थारी-लोटा तो नहीं 
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी 
अच्छा-ख़राब होने पर 
जो बात-बात में 
बात करे लाठी-डंडा की 
निकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ी 
जब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीर 
ऐसा वर नहीं चाहिए हमें 
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ 
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाए 
फ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों ने 
जिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथ 
किसी का बोझ नहीं उठाया 
और तो और! 
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथ 
उसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ! 
ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहना 
जहाँ सुबह जाकर 
शाम तक लौट सको पैदल 
मैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाट 
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम 
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप 
महुआ की लट और 
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिर 
उधर से आते-जाते किसी के हाथ 
भेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टी 
समय-समय पर गोगो के लिए भी 
मेला-हाट-बाज़ार आते-जाते 
मिल सके कोई अपना जो 
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल 
चितकबरी गैया के बियाने की ख़बर 
दे सके जो कोई उधर से गुज़रते 
ऐसी जगह मुझे ब्याहना! 
उस देश में ब्याहना 
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों 
बकरी और शेर 
एक घाट पानी पीते हों जहाँ 
वहीं ब्याहना मुझे! 
उसी के संग ब्याहना जो 
कबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरह 
रहे हरदम हाथ 
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर 
रात सुख-दुख बाँटने तक 
चुनना वर ऐसा 
जो बजाता हो बाँसुरी सुरीली 
और ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगत 
वसंत के दिनों में ला सके जो रोज़ 
मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूल 
जिससे खाया नहीं जाए 
मेरे भूखे रहने पर 
उसी से ब्याहना मुझे!

- निर्मला पुतुल
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संपादकीय चयन 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

क्या तुम जानते हो?

 क्या तुम जानते हो

पुरुष से भिन्न

एक स्त्री का एकांत?

घर, प्रेम और जाति से अलग

एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन

के बारे में बता सकते हो तुम?

बता सकते हो

सदियों से अपना घर तलाशती

एक बेचैन स्त्री को

उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो

अपनी कल्पना में

किस तरह एक ही समय में

स्वयं को स्थापित और निर्वासित

करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती

एक स्त्री का पीछा करते

कभी देखा है तुमने उसे

रिश्तों के कुरुक्षेत्र में

अपने आपसे तड़ते?

 

तन के भूगोल से परे

एक स्त्री के

मन की गाँठें खोल कर

कभी पढ़ा है तुमने

उसके भीतर का खौलता इतिहास?

पढ़ा है कभी

उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ

शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बाते

क्या तुमने कभी महसूसा है

उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?

क्या तुम जानते हो

एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम

एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते

उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!

तो फिर जानते क्या हो तुम

रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में...?

- निर्मला पुतुल

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संपादकीय चयन