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गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

साइकिल

दोनों पैडल पिता के पाँव हैं
टायर पिता के जूते
मुठिया उनके हाथ
कैरियर उनका झोला
हर रोज़ जाती है
उन्हें लेकर
और लाती है लादकर
गाते हुए लहराते हुए
बिना किसी हेडलाइट के भी
वह घुप्प अँधेरे में
चीन्ह लेती है अपनी राह
और मुड़ जाती है घर की ओर
हर रात पिता को
घर तक छोड़कर
फिर ख़ुद सोती है साइकिल
भूखी दीवार से सटकर
साइकिल
जो पिता की अभिन्न साथी है
किसी पेट्रोल-पंप तक नहीं जाती
कोई पेट्रोल नहीं पीती
जिसका अक्षय ईंधन
छिपा है पिता के पाँव में

 - संदीप तिवारी
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संपादकीय चयन 

रविवार, 3 दिसंबर 2023

बिना पानी के

बिना पानी के
न ये घर साफ़ होगा
न दर साफ़ होगा
बिना पानी के

ये कपड़े ये लत्ते
ये गाड़ी ये घोड़े
ये रस्ते ये सड़कें
शहर के शहर ये 
नहीं साफ़ होंगे बिना पानी के

बिना पानी के
न ये तन साफ़ होगा
न मन साफ़ होगा
बिना पानी के

बिना पानी के
न तो तुम साफ़ होगे
न हम साफ़ होंगे
बिना पानी के 

- संदीप तिवारी।
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विजया सती के सौजन्य से 

शनिवार, 25 नवंबर 2023

छुट्टी के एक दिन में

मेज़ पर, घर में, किताबों पर
आई हुई धूल झाड़ेंगे
जितना रोज़ सोते हैं 
उससे कुछ देर अधिक सो जाऐंगे 
पूरे हफ़्ते के पड़े हुए कपड़े 
उन्हें भी धुलना होगा 
छुट्टी के एक दिन में ही

छुट्टी के एक दिन में 
कोई किताब लेकर बैठ जाऐंगे 
या कोई सुना हुआ गीत फिर सुन लेंगे 
समय बचा तो ख़रीदारी के लिए
थोड़ी देर बाज़ार निकल जाऐंगे 

कोई आराम नहीं होता 
छुट्टी के एक दिन में, 
छुट्टी के एक दिन में भी 
छुट्टियों वाले सैकड़ों काम होते हैं

संदीप तिवारी।
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विजया सती के सौजन्य से 

मंगलवार, 21 नवंबर 2023

पुल

पुल कोई भी हो
कितना भी मज़बूत हो
उसकी एक मियाद होती है
उसे भी एक दिन टूटना ही होता है
लेकिन कोई भी पुल
जब भी टूटे;
दूसरा पुल और ऊँचा
बन सकता है,

जैसे नदियों पर बना कोई पुल
जब भी टूटता है,
पुराने पुल के बगल
दूसरा पुल हमेशा
और ऊँचा बनता है 

- संदीप तिवारी।
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विजया सती के सौजन्य से 

शनिवार, 18 नवंबर 2023

तलब

मैं चाय पीने के लिए
दुकान पर नहीं गया
दुकान पर गया
क्योंकि थोड़ी देर दुकान पर बैठने का मन था

दुकान पर आते-जाते लोगों को देखना था
उनकी बातें सुननी थी
और मुझे चुप रहना था

चाय को उबलते हुए
और उसे कुल्हड़ में छनते हुए देखना था
मुझे थोड़ी देर के लिए
अपने घर, कुर्सी, दरवाज़े को भूलना था
अपने कामों को भूलना था
और खुद को भूलना था

इसलिए गया चाय की दुकान पर
मुझे चाय की तलब कभी नहीं लगती
हाँ घर से निकलने की तलब लगती है

- संदीप तिवारी।
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विजया सती के सौजन्य से