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गुरुवार, 2 मई 2024

नीरज के दोहे

दोहा वर है और है कविता वधू कुलीन
जब इसकी भाँवर पड़ी जन्मे अर्थ नवीन  

जहाँ मरण जिसका लिखा वो बानक बन आए
मृत्यु नहीं जाये कहीं, व्यक्ति वहाँ खुद जाए

ज्ञानी हो फिर भी न कर दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है, भले ही मणि हो उसके पास 

दूध पिलाये हाथ जो डसे उसे भी साँप
दुष्ट न त्यागे दुष्टता कुछ भी कर लें आप  

तोड़ो, मसलो या कि तुम उस पर डालो धूल
बदले में लेकिन तुम्हें खुशबू ही दे फूल  

पूजा के सम पूज्य है जो भी हो व्यवसाय
उसमें ऐसे रमो ज्यों जल में दूध समाय 

हम कितना जीवित रहे, इसका नहीं महत्व
हम कैसे जीवित रहे, यही तत्व अमरत्व

स्नेह, शान्ति, सुख, सदा ही करते वहाँ निवास
निष्ठा जिस घर माँ बने, पिता बने विश्वास

- गोपालदास नीरज।
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

शनिवार, 13 जनवरी 2024

रोने वाला ही गाता है

मधु-विष हैं दोनों जीवन में 
दोनों मिलते जीवन-क्रम में
पर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ बढ़ जाता है।
रोने वाला ही गाता है! 

प्राणों की वर्त्तिका बनाकर 
ओढ़ तिमिर की काली चादर 
जलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है। 
रोने वाला ही गाता है! 

अरे! प्रकृति का यही नियम है 
रोदन के पीछे गायन है 
पहले रोया करता है नभ, पीछे इंद्रधनुष छाता है। 
रोने वाला ही गाता है!

- गोपालदास नीरज।
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