मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

विचार आते हैं

विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय
चाँद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में

विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
...पत्थर ढोते वक़्त
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ
साँप मारते समय पिछवाड़े
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त

पत्थर पहाड़ बन जाते हैं
नक्शे बनते हैं भौगोलिक
पीठ कच्छप बन जाती है
समय पृथ्वी बन जाता है...

- गजानन माधव मुक्तिबोध।
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आभार - हरप्रीत सिंह पुरी 

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा

किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा

ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा

डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा

- अहमद फ़राज़।
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आभार - हरप्रीत सिंह पुरी 

रविवार, 28 अप्रैल 2024

आम और पत्तियाँ

टोकरी में रखे आम 
याद तो करते होंगे 
पत्तियों के संग-साथ को 
क्या कभी जाना है तुमने 
आम और पत्तियों का अंतर्संबंध? 
साथ-साथ हवा में झूमे, चहके-महके 
बारिश में नहाए, एक साथ बौराए 
शाख़ से टपकते आम के लिए 
अकुलाती तो होंगी पत्तियाँ 
पत्थर की चोट खाकर 
आह के साथ बिछुड़ते 
आम के लिए 
दुख से कराहती हैं पत्तियाँ 
कभी आम की मिठास में 
चखो तो सही तुम 
पत्तियों की पीड़ा!

- मुकेश निर्विकार।
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संपादकीय चयन 

शनिवार, 27 अप्रैल 2024

टेढ़ी-मेढ़ी चाल

मुझे
सीधा चलने से
परहेज़ नहीं है
मगर
ऐसे टेढ़े-मेढ़े
चलने से
टेढ़ा-मेढ़ा चलने लगता है
चाँद भी।

युगों-युगों से
सीधी चली आ रही
सड़क में भी
आ जाता है
हल्का-सा टेढ़ापन
और इसी टेढ़ेपन में
ज़िंदा रह जाते हैं
कुछ मुहावरे
बिखराव के।
 
- अर्पिता राठौर।
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संपादकीय चयन 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही
तो मत करो कुछ ऐसा
कि जो किसी तरह सोए हैं 
उनकी नींद हराम हो जाए

हो सके तो बनो पहरुए
दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें
गाओ कुछ शांत मद्धिम
नींद और पके उनकी जिससे

सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं
और सोई स्त्रियों के चेहरों पर
हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम
और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो
नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी
दुश्मनी का कोई निशान

अगर नींद नहीं आ रही हो तो
हँसो थोड़ा, झाँको शब्दों के भीतर
ख़ून की जाँच करो अपने
कहीं ठंडा तो नहीं हुआ

- चंद्रकांत देवताले।
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साभार - हरप्रीत सिंह पुरी

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

क्या तुम जानते हो?

 क्या तुम जानते हो

पुरुष से भिन्न

एक स्त्री का एकांत?

घर, प्रेम और जाति से अलग

एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन

के बारे में बता सकते हो तुम?

बता सकते हो

सदियों से अपना घर तलाशती

एक बेचैन स्त्री को

उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो

अपनी कल्पना में

किस तरह एक ही समय में

स्वयं को स्थापित और निर्वासित

करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती

एक स्त्री का पीछा करते

कभी देखा है तुमने उसे

रिश्तों के कुरुक्षेत्र में

अपने आपसे तड़ते?

 

तन के भूगोल से परे

एक स्त्री के

मन की गाँठें खोल कर

कभी पढ़ा है तुमने

उसके भीतर का खौलता इतिहास?

पढ़ा है कभी

उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ

शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बाते

क्या तुमने कभी महसूसा है

उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?

क्या तुम जानते हो

एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम

एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते

उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?

अगर नहीं!

तो फिर जानते क्या हो तुम

रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में...?

- निर्मला पुतुल

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संपादकीय चयन 

बुधवार, 24 अप्रैल 2024

माँएँ

सबसे बचा कर
छुपाकर
रखती है संदूक में
पुरानी,
बीती हुई,
सुलगती, महकती
कही-अनकही 
बातें मन की
मसालों से सने हाथों में
अक्सर छुपाकर ले जाती हैं
अपने
गीले आँसू
और ख्वाबों की गठरियाँ
देखते हुए आईना
अक्सर भूल जाती हैं
अपना चेहरा
और खालीपन ओढ़े
समेटती हैं घर भर की नाराजगी
चूल्हे का धूआँ
उनकी बांह पकड़
पूछता है
उनके पंखों की कहानी
बनाकर कोई बहाना
टाल जाती हैं
धूप की देह पर
अपनी उँगलियों से
लिखती है
कुछ...
रोक कर देर तक सांझ को
टटोलती है
अपनी परछाइयाँ
रात की मेड़ पर
देखती है
उगते हुए सपने
और
ख़ामोशी के भीतर
बजती हुई धुन पहनकर
घर भर में
बिखर जाती है!

- अनुप्रिया।
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संपादकीय चयन 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2024

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसअला बन कर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मिरा अहद-ए-वफ़ा
इक तिरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा

- वसीम बरेलवी।
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अनूप भार्गव की पसंद 

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

दिन गीत-गीत हो चला

एक क्षण तुम्‍हारे ही मीठे संदर्भ का,
सारा दिन गीत-गीत हो चला।

फैलने लगे मन से देह तक
चाँदनी-कटे साये राह के,
अजनबी निगाहों ने तय किए
फासले समानांतर दाह के,
अग्नि-झील तक हम को ले गई
जोड़ भर गुलाबों की शृंखला।

तोड़कर घुटन वाले दायरे
एक प्‍यास शब्‍दों तक आ गई,
कंधों पर मरुथल ढोते हुए
हरी गंध प्राणों पर छा गई,
पल में कोई तुम से सीखे -
मन को फागुन करने की कला।

- सोम ठाकुर।
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ऋचा जैन की पसंद 

रविवार, 21 अप्रैल 2024

सृजन बिकने नहीं देंगे

भले ही तुम प्रलोभन दो हमें अपनी कृपाओं के,
मगर हम लेखनी का बांकपन बिकने नहीं देंगे।
भले बाग़ी बताओ या हमें फाँसी चढ़ाओ तुम,
मगर हम मौत के डर से सृजन बिकने नहीं देंगे।

वही हमने लिखा है आज तक जो कुछ सहा हमने
भला डर कर किसी भी रात को कब दिन कहा हमने
इसी से हम उपेक्षित रह गए उनकी सभाओं में
न उनके साथ महफ़िल में लगाया कहकहा हमने।

निमंत्रण मिल रहे हैं आज भी सुविधा भरे हमको
मगर तन के लिए खुद्दार मन बिकने नहीं देंगे।

- उर्मिलेश।
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

शनिवार, 20 अप्रैल 2024

सफलता पाँव चूमे

सफलता पाँव चूमे गम का कोई भी न पल आए
दुआ है हर किसी की जिंदगी में ऐसा कल आए।

ये डर पतझड़ में था अब पेड़ सूने ही न रह जाएँ
मगर कुछ रोज़ में ही फिर नए पत्ते निकल आए।

हमारे आपके खुद चाहने भर से ही क्या होगा
घटाएँ भी अगर चाहें तभी अच्छी फसल आए।

हमें बारिश ने मौका दे दिया असली परखने का
जो कच्चे रंग वाले थे वो अपने रंग बदल आए।

जहाँ जिस द्वार पर देखेंगे दाना आ ही जाएँगे
परिंदों को भी क्या मतलब कुटी आए महल आए।

हमारा क्या हम अपनी दुश्मनी भी भूल जाएँगे
मगर उस ओर से भी दोस्ती की कुछ पहल आए।

अभी तो ताल सूखा है अभी उसमें दरारें हैं
पता क्या अगली बरसातों में उसमें भी कमल आए।

- कमलेश भट्ट 'कमल'।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

रसोई

एक दिन बैठे-बैठे उसने
अजीब बात सोची

सारा दिन
खाने में जाता है
खाने की खोज में
खाना पकाने में
खाना खाने खिलाने में
फिर हाथ अँचा फिर उसी दाने की टोह में

सारा दिन सालन अनाज फल मूल
उलटते पलटते काटते कतरते रिंधाते
यों बिता देते हैं जैसे
इस धरती ने बिताए करोड़ों बरस
दाना जुटाते दाना बाँटते
हर जगह हर जीव के मुँह में जीरा डालते
इस तरह की यह पूरी धरती
एक रसोई ही तो है
एक लंगर
वाहे गुरू का!

- अरुण कमल।
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गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

यात्री-मन

छल-छलाई आँखों से
जो विवश बाहर छलक आए
होंठ ने बढ़कर वही
आँसू सुखाए
सिहरते चिकने कपोलों पर
किस अपरिभाषित
व्यथा की टोह लेती
उँगलियों के स्पर्श गहराए।

हृदय के भू-गर्भ पर
जो भाव थे
संचित-असंचित
एक सोते की तरह
फूटे बहे,
उमड़े नदी-सागर बने
फिर भर गए आकाश में
घुमड़ कर
बरसे झमाझम
हो गया अस्तित्व जलमय

यात्रा पूरी हुई, लय से प्रलय तक,
देहरी से देह की चलकर, हृदय तक।

एक दृढ़ अनुबंध फिर से लिख गया
डूबते मन को किनारा दिख गया।

- जगदीश गुप्त।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

लिखी हुई संदिग्ध भूमिका

लिखी हुई संदिग्ध भूमिका
जब चेहरे की पुस्तक पर
भीतर के पृष्ठों, अध्यायों को
पढ़कर भी क्या होगा?

चमकीला आवरण सुचिक्कन
और बहुत आकर्षक भी
खिंचा घने केशों के नीचे
इंद्रधनुष-सा मोहक भी

देखे, मगर अदेखा कर दे
नज़र झुका कर चल दे जो
ऐसे अपने-अनजाने के सम्मुख
बढ़कर भी क्या होगा?

अबरी गौंद शिकायत की है
मुस्कानों की जिल्द बँधी
होंठों पर उफ़नी रहती है
परिवादों से भरी नदी
 
अगर पता चल जाए कथा का
उपसंहार शुरू में ही
तो फिर शब्दों की लंबी सीढ़ी
चढ़कर भी क्या होगा?

- कुमार शिव।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

छंद को बिगाड़ो मत

छंद को बिगाड़ो मत, गंध को उजाड़ो मत
कविता-लता के ये सुमन झर जाएँगे।

शब्द को उघाड़ो मत, अर्थ को पछाड़ो मत,
भाषण-सा झाड़ो मत गीत मर जाएँगे।

हाथी-से चिंघाड़ो मत, सिंह से दहाड़ो मत
ऐसे गला फाड़ो मत, श्रोता डर जाएँगे।

घर के सताए हुए आए हैं बेचारे यहाँ
यहाँ भी सताओगे तो ये किधर जाएँगे।

- ओम प्रकाश 'आदित्य'।
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

धूप का गीत

धूप धरा पर उतरी 
जैसे शिव के जटाजूट पर 
नभ से गंगा उतरी। 

धरती भी कोलाहल करती 
तम से ऊपर उभरी
धूप धरा पर बिखरी

बरसी रवि की गगरी, 
जैसे ब्रज की बीच गली में 
बरसी गोरस गगरी। 

फूट-कटोरों-सी मुस्काती
रूप-भरी है नगरी
धूप धरा पर बिखरी

- केदारनाथ अग्रवाल।
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रविवार, 14 अप्रैल 2024

इक नज़्म

ये राह बहुत आसान नहीं,
जिस राह पे हाथ छुड़ाकर तुम
यूँ तन तन्हा चल निकली हो
इस खौफ़ से शायद राह भटक जाओ ना कहीं
हर मोड़ पर मैंने नज़्म खड़ी कर रखी है!

थक जाओ अगर-
और तुमको ज़रूरत पड़ जाए,
इक नज़्म की ऊँगली थाम के वापस आ जाना!

- गुलज़ार।
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शनिवार, 13 अप्रैल 2024

उषा की लाली

उषा की लाली में
अभी से गए निखर
हिमगिरि के कनक शिखर!

आगे बढ़ा शिशु रवि
बदली छवि, बदली छवि
देखता रह गया अपलक कवि
डर था, प्रतिपल
अपरूप यह जादुई आभा
जाए ना बिखर, जाए ना बिखर...

उषा की लाली में
भले हो उठे थे निखर
हिमगिरि के कनक शिखर!

- नागार्जुन।
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शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

नीम

खेत जग पड़े थे 
पत्तों से फूट रही थी चैत के शुरू की 
हल्की-हल्की लाली 
सोचा, मौसम बढ़िया है 
चलो तोड़ लाएँ नीम के दो-चार 
हरे-हरे छरके 
मैं तो उन्हें भूल चुका था 
पर मेरे दाँतों को वे अब भी 
बहुत याद आते थे 
फिर चल दिया अकेला 
सुपरिचित मेड़ों और पगडंडियों को 
लाँघता-फलाँगता हुआ 
पहुँचा गाँव के उस ऊँचे सिवान पर 
जहाँ खड़ा था न जाने कितने बरसों से 
वह घना-पुराना नीम का पेड़ 
रुका, 
कुछ देर उसे ध्यान से देखा 
फिर झुकाई एक डाल 
खींच ली एक छोटी-सी हरी छरहरी 
काँपती हुई टहनी 
बस तोड़ने को ही था 
कि अचानक दृष्टि पड़ी नीचे— 
अरे, यह कौन? 
नीमतले बैठा है 
आँख मूँदे मौन! 
पड़ गया सोच में 
दतुअन तोड़ूँ कि न तोड़ूँ 
पकड़े रहूँ कि छोड़ दूँ वह टहनी 
जो मेरे हाथ में थी! 
अंत में 
न जाने क्या आया जी में 
कि मैंने एक अजब-सी पीड़ा से 
उस तरफ़ देखा 
जिधर बैठा था वह आदमी 
और छोड़ दी नीम की झुकी हुई टहनी 
फिर लौट आया 
रास्ते भर ख़ुद से लड़ता और ख़ुद को समझता हुआ 
कि यदि कहीं तोड़ ही लेता 
कुछ हरी कच्ची उमगती हुई शाखें 
तो उसका क्या होता 
जो उन्हीं के नीचे बैठा था 
उन्हीं के जादू में 
बंद किए आँखें!

- केदारनाथ सिंह।
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गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

कृतज्ञता

धूप और गरमी में तपता 
पसीने से लथपथ 
वह उस वृक्ष की छाया तले पहूँचा। 
छाया क्या थी। 
जल था, 
टिका दी तने से कुल्हाड़ी 
और गमछा बिछा लेट गया 
निश्चिंत। 

नींद जब खुली 
पहर ढल रहा था, 
वह हड़बड़ाता उठा 
और लगा पेड़ काटने।

 - श्रीनरेश मेहता।
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बुधवार, 10 अप्रैल 2024

अपने घर में ही अजनबी की तरह

अपने घर में ही अजनबी की तरह 
मैं सुराही में इक नदी की तरह 

किस से हारा मैं ये मिरे अंदर 
कौन रहता है ब्रूसली की तरह 

उस की सोचो में मैं उतरता हूँ 
चाँद पर पहले आदमी की तरह 

अपनी तन्हाइयों में रखता है 
मुझ को इक शख़्स डाइरी की तरह 

मैं ने उस को छुपा के रक्खा है 
ब्लैक आउट में रौशनी की तरह 

टूटे बुत रात भर जगाते हैं 
सुख परेशाँ है ग़ज़नवी की तरह 

बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर 
उस की यादें हैं जनवरी की तरह 

वक़्त सा है अनंत इक चेहरा 
और मैं रेत की घड़ी की तरह 

- सूर्यभानु गुप्त।
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अनूप भार्गव की पसंद

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

औरतें और हम

ये औरतें हैं या कि
ज़िंदगी भर की दुश्वारियाँ
एक पल को न सुकून लेती हैं न लेने देती हैं

भोर में ही उठ जाती हैं
बर्तन खड़खड़ाती हैं
चकिया घिरघिराती हैं (मिक्सी घड़घड़ाती हैं)
झाड़ू खरखराती हैं
फिर भी घुस पुसकर किसी तरह गड़े रहो बिस्तर में तो
नाश्ता लिए सिर पर मँडराती हैं

ये औरतें हैं या कि
घर की चारदीवारियाँ
ख़ुद तो कैद हैं ही 
हमें भी करना चाहती हैं

कहीं जाओ तो जाने का पता पूछती हैं
बता दो तो जाने की वजह पूछती हैं
देर से आओ तो सवाल करती हैं
और अगर न आओ तो बवाल करती हैं
दिनभर बेवजह फोन कर-करके हमारी सलामती पूछती हैं
जब झल्ला जाओ तो माफ़ी माँगती हैं
और फिर अगले दिन वही गलती 
पूरे शिद्दत से दुहराती हैं

ये औरतें हैं या कि
नाचती हुई चकरघिन्नियाँ
ख़ुद को ज़िंदगी भर 
दूसरों की ताल पर नचाती हैं

हमारी खुशी में हमसे ज़्यादा खुश होती हैं
हमारी उदासी में रोती हैं और इर्द-गिर्द मँडराती हैं
हमारे लिए हर तीज त्योंहार उपवास में गँवाती हैं
किसी वजह से अगर हम खाना न खाएँ तो
आगे-पीछे के कई दिनों का हिसाब लगाती हैं और
अपनी ही कोई गलती ढूँढकर पछताती हैं
हमारी सफलता की मुट्ठी भर राई पूरी धरती पर बो आती हैं
हमारी नाकामियों के काँटों को 
अपनी देह की मिट्टी में दबाती हैं, छुपाती हैं

ये औरतें हैं या कि
पागल-सी बदलियाँ
हमारे सूखे दिनों पर बिन कहे बरस जाती हैं

कितनी भी सख़्ती दिखाएँ 
पर एक स्पर्श से पिघल जाती हैं
हम धूप में हों तो ख़ुद को 
छाया में बदलने का जादू दिखाती हैं
हरियाली इनके होने का रंग है
तवज्जो न मिले तो घास बनी रहती हैं
मिल जाए तो नीम पीपल आम बन गछनार हो जाती हैं

ये औरतें हैं या कि
हम एहसानफरामोशों की डायरियाँ
इनको पढ़ो तो बस आइना दिखाती हैं

इनके हर पृष्ठ पर फैली है हमारी उपेक्षा की बदरंग स्याही
हर पंक्ति में बिखरे पड़े हैं हमारी चालाकियों के हर्फ़ 
इनमें पढ़ी जा सकती है हमसे की गई 
और फिर बेमौत मरी उम्मीदों की रुदाली
तलाशा जा सकता है संबंधों का अस्त-पस्त व्याकरण
तितर-बितर औंधी पड़ी सामंजस्य की मात्राएँ
जगह-जगह बाधित प्रेम का अल्पविराम और फिर पूर्णविराम।

- आलोक कुमार मिश्रा।
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विजया सती के सौजन्य से 

सोमवार, 8 अप्रैल 2024

इच्छा

मैं जब उठूँ तो भादों हो 
पूरा चंद्रमा उगा हो ताड़ के फल सा
गंगा भरी हो धरती के बराबर 
खेत धान से धधाए
और हवा में तीज त्यौहार की गमक

इतना भरा हो संसार 
कि जब मैं उठूँ तो चींटी भर जगह भी 
खाली न हो 

- अरुण कमल।
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रविवार, 7 अप्रैल 2024

तू इतना प्यार न कर मुझसे

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ! 

जो प्यारी लगे सभी को ही 
मैं ऐसी कोई बात नहीं 
हूँ मरुस्थल की सूखी रेती 
मैं मेघ बनूँ औक़ात नहीं 

पर मेघ बनूँ तो यह मन है 
तेरे घर-आँगन में बरसूँ! 

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ! 

पानी था, लेकिन दुनिया ने 
कह दिया मुझे पत्थर-काया 
सबकी नज़रों का काँटा मैं 
खिलकर भी फूल न बन पाया 

हाँ, अगर कभी मैं फूल बनूँ 
तेरी फुलबग़िया में सरसूँ! 

तू इतना प्यार न कर मुझसे 
जो ख़ुद से मिलने को तरसूँ!

- कुँअर बेचैन।
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शनिवार, 6 अप्रैल 2024

बड़े बेख़ौफ़ होकर आज पंछी डोलते हैं

बड़े बेख़ौफ़ होकर आज पंछी डोलते हैं 
सदी ख़ामोश बैठी है कि पत्थर बोलते हैं 

यही पल है कि जिस पल में हमारे पास बैठो 
कि आओ आज हम गिरहें दिलों की खोलते हैं 

नहीं मज़हब, नहीं दौलत, न सामाँ की ज़रूरत 
मुहब्बत को मुहब्बत की नज़र से तोलते हैं 

बहुत से लोग हैं जो अब भी उल्फ़त बो रहे हैं 
बहुत से लोग नफ़रत का ही मट्ठा घोलते हैं 

सबक़ कोई किताबी याद रहता ही नहीं है 
जो सीखा ज़िंदगी से बस वही हम बोलते हैं 

जो झूठे हैं, बहुत महफ़ूज़ हैं दुनिया में अपनी 
ये सच्चे लोग हैं, जो सर पे आफ़त मोलते हैं

- लक्ष्मण गुप्त।
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

अँधेरों के विरुद्ध

पिघलने दो
बर्फ़ होते सपनों को
कि
बनते रहें
आँखों में उजालों के नए प्रतिबिंब 
छूने दो
अल्हड़ पतंगों को
आकाश की हदें
कि गढ़े जाएँ
ऊँचाई के नित नए प्रतिमान
बढ़ने दो
शोर हौंसलों का
कि
घुलते रहें
रौशनी के हर नए रंग
ज़िंदगी में
हर अँधेरे के विरुद्ध।

- अनुप्रिया।
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गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

पगडंडी

जहाँ से सड़क ख़त्म होती है
वहाँ से शुरू होता है
यह सँकरा रास्ता
बना है जो कई वर्षों में
पाँवों की ठोकरें खाने के बाद,
इस पर घास नहीं उगती
न ही होते हैं लैम्पपोस्ट
सिर्फ़ भरी होती है ख़ुशियाँ
लोगों के घर लौटने की!

- नरेश अग्रवाल।
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बुधवार, 3 अप्रैल 2024

पहाड़ों के अप्रैल के ज़ख़्मों का क़सीदा

कतारबद्ध भिक्षुओं की तरह विनम्र खड़े 
सात काफल के पेड़ों पर फल आ चुके हैं।
सुर्ख लाल फूलों से लदे बुरांश की सघनता में 
एक मुनाल टहनियों पर फुदक रहा है।
बांज के जंगलों की गहरी छाया में 
झींगुरों की एकरस आवाज़ें हैं।
चिंतनरत सरू और देवदारु के 
पेड़ों के बीच से झाँकती हैं बर्फीली चोटियांँ
रह-रहकर बादल उन्हें छेड़ रहे हैं

पहाड़ों में अप्रैल के सुनसान में 
प्यार करने,
बेवफ़ाइयों की विवशता को याद करने 
और टीसते हृदय में 
तपती चमकती कटार घोंपकर 
हाराकीरी करने के बारे में 
सोचा जा सकता है
एक विचारहीन साहस और वैराग्य भाव की
गिरफ़्त में फँसकर।

सहसा बज उठता है मोबाइल 
मानवीय तुच्छताओं की याद दिलाते हुए,
एक दार्शनिक मृत्यु और स्वार्थपूर्ण प्यार के 
ऐन्द्रजालिक आकर्षण से उबारते हुए 
और यह याद दिलाते हुए कि 
कल सुबह नीचे मैदानों की ओर रवाना हो जाना है 
जीवन की ठोस वास्तविकताओं की ओर।

तुच्छताओं के बीच 
उदात्तता की खोज जारी रहे 
और जीवन में थोड़ी कविता 
हर सूरत में बची रहे,
ऐसा सोचना भी 
इतिहास-बोध का ही एक हिस्सा है।

- कात्यायनी।
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  • काफल - पहाड़ का एक फल जो बेर जैसा होता है।
  • मुनाल - एक पक्षी
  • बांज - पहाड़ में एक वृक्ष का नाम जैसे चीड़, देवदार।
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विजया सती के सौजन्य से।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं
 
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से
मुहब्बत से ही खुश्बू, फूल, सूरज, चाँद होते हैं
 
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख़ बदलने की
परिंदे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढोते हैं
 
अजब से कुछ भुलैयों के बने हैं रास्ते उनके
पलट के फिर कहाँ आए, जो इन गलियों में खोते हैं
 
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्‍ह थोड़ा तो
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख़्वाब सोते हैं
 
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं
 
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है
वो कोई और होंगे अपनी क़िस्मत पे जो रोते हैं

- गौतम राजऋषि।
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सोमवार, 1 अप्रैल 2024

मेरे स्वर में स्वर यदि दोगे

मेरे स्वर में स्वर यदि दोगे 
मैं नभ में गायन भर दूँगा

आज अकेले का बल क्या है 
बलि देने का ही फल क्या है 
एकाकी हूँ मैं वन-पथ पर 
आज क्षरण, जाने कल क्या है 

मेरे कर में कर यदि दोगे 
मैं अनंत यौवन वर लूँगा 

बड़ी-बड़ी अभिलाषाएँ हैं
खंडित सारी आशाएँ हैं 
अधर-अधर ने गरल पिया है 
दलित सत्य की भाषाएँ हैं 

मुझे समर के शर यदि दोगे 
मैं संसृति का दुख हर लूँगा 

- कृष्ण मुरारी पहारिया।
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