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गुरुवार, 26 सितंबर 2024

प्रेम की परिक्रमा

जब मैं प्रेम करता हूँ अपने से 
अच्छा लगता है पानी का दरख़्त 
और मेरे भीतर से उछलकर कुछ बीज 
प्रवेश करते हैं शब्दों के भीतर 

जब मैं प्रेम करता हूँ तुमसे-सबसे 
अच्छी लगती है भरी-पूरी नदी 
और नक्षत्र-लोक से बरसती दुआएँ 
जोत जगाती हैं आँगन के दियों में 

जब हम प्रेम करते हैं पृथ्वी से 
आँखों में तैरते हैं सातों समुद्र 
और पुरखों के सपनों की पताकाएँ 
फहराने लगती हैं समय के आकाश में 
पानी का दरख़्त नदी में 
और नदी समुद्र में मिल जाती है 

फिर भी पूरी नहीं होती प्रेम की परिक्रमा 
क्षितिजों के पार कुछ ढूँढ़ती ही रहती हैं 
कवियों की आँखें।

- चंद्रकांत देवताले
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही
तो मत करो कुछ ऐसा
कि जो किसी तरह सोए हैं 
उनकी नींद हराम हो जाए

हो सके तो बनो पहरुए
दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें
गाओ कुछ शांत मद्धिम
नींद और पके उनकी जिससे

सोए हुए बच्चे तो नन्हें फरिश्ते ही होते हैं
और सोई स्त्रियों के चेहरों पर
हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम
और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो
नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी
दुश्मनी का कोई निशान

अगर नींद नहीं आ रही हो तो
हँसो थोड़ा, झाँको शब्दों के भीतर
ख़ून की जाँच करो अपने
कहीं ठंडा तो नहीं हुआ

- चंद्रकांत देवताले।
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साभार - हरप्रीत सिंह पुरी

रविवार, 27 अगस्त 2023

माँ पर नहीं लिख सकता कविता

माँ के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिउँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चंद्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

चंद्रकांत देवताले।

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संपादकीय पसंद 

बुधवार, 16 अगस्त 2023

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

तुम्हारी निश्चल आँखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लंबी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नंबर है मेरा
पर बच्चों के फूलों वाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना 
मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूँ सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से 
परे है तुम्हारी परछाई

- चंद्रकांत देवताले।
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कुमार अनुपम की पसंद