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शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

मुझमें हो तुम

कहीं मुझमें ही तो तुम
शारदीय नदी के जल में
उगते सूरज की तरह
किताबों के पन्नों में
छिपी सार्थक बातों की तरह
कहीं मुझमें ही हो तुम।

सूने कैनवस पर
उभरने वाले रंगों की तरह
कहीं मुझमें ही हो तुम।

- राकेश मिश्र
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संपादकीय चयन 

रविवार, 5 जनवरी 2025

आँखें

एक नदी हैं
मेरी आँखें
जिसके तटों को
छू-छू के रह जाती हैं
तुम्हारी पलकों की नाव।

- राकेश मिश्र
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संपादकीय चयन 

रविवार, 17 दिसंबर 2023

ट्रेनें

ट्रेनें
एक भागता हुआ
घर होती हैं
जिनमें खिड़कियाँ ज्यादा
दरवाजे कम होते हैं
दृश्यावलियाँ ज्यादा
हस्तक्षेप कम होता है

जिनमें
चर्चाएँ बैठी रहती हैं
निष्कर्ष उतर जाते हैं

- राकेश मिश्र 
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कविता संग्रह 'कवि का शहर' से
विजया सती की पसंद