राकेश मिश्र
लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं.
सभी संदेश दिखाएं
राकेश मिश्र
लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं.
सभी संदेश दिखाएं
शुक्रवार, 10 जनवरी 2025
मुझमें हो तुम
कहीं मुझमें ही तो तुम
शारदीय नदी के जल में
उगते सूरज की तरह
किताबों के पन्नों में
छिपी सार्थक बातों की तरह
कहीं मुझमें ही हो तुम।
सूने कैनवस पर
उभरने वाले रंगों की तरह
कहीं मुझमें ही हो तुम।
- राकेश मिश्र
--------------
संपादकीय चयन
रविवार, 5 जनवरी 2025
आँखें
एक नदी हैं
मेरी आँखें
जिसके तटों को
छू-छू के रह जाती हैं
तुम्हारी पलकों की नाव।
- राकेश मिश्र
---------------
संपादकीय चयन
रविवार, 17 दिसंबर 2023
ट्रेनें
ट्रेनें
एक भागता हुआ
घर होती हैं
जिनमें खिड़कियाँ ज्यादा
दरवाजे कम होते हैं
दृश्यावलियाँ ज्यादा
हस्तक्षेप कम होता है
जिनमें
चर्चाएँ बैठी रहती हैं
निष्कर्ष उतर जाते हैं
- राकेश मिश्र
--------------
कविता संग्रह 'कवि का शहर' से
विजया सती की पसंद
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
बात सीधी थी पर
बात सीधी थी पर एक बार भाषा के चक्कर में ज़रा टेढ़ी फँस गई। उसे पाने की कोशिश में भाषा को उलटा पलटा तोड़ा मरोड़ा घुमाया फिराया कि बात या तो ब...
खजुराहो में मूर्तियों के पयोधर
पत्थरों में कचनार के फूल खिले हैं इनकी तरफ़ देखते ही आँखों में रंग छा जाते हैं मानो ये चंचल नैन इन्हें जनमों से जानते थे। मानो हृदय ही फूला...
ट्राम में एक याद
चेतना पारीक कैसी हो? पहले जैसी हो? कुछ-कुछ ख़ुश कुछ-कुछ उदास कभी देखती तारे कभी देखती घास चेतना पारीक, कैसी दिखती हो? अब भी कविता लिखती हो? ...