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शनिवार, 29 जून 2024

उसने पत्तियों को चूमा

जंगल से गुज़रते हुए उसने
ओक के पेड़ की पत्तियों को चूमा
जैसे अपनी माँ की हथेलियों को चूमा

कहा- यह मेरी माँ का हाथ पकड़कर बड़ा हुआ है
इसके पास आज भी उसका स्पर्श है
जंगल का हाथ पकड़कर
मेरे पुरखे भी बड़े हुए

वे नहीं हैं पर यह आज भी वहीं खड़ा है
इसने मेरे पुरखों की स्मृतियों
और स्पर्शों को बचाकर रखा है
उन्हें महसूस करने के लिए
मैं इन्हें छूता हूँ, चूमता हूँ
मैं इनसे प्यार करता हूँ

जानती हो?
एक पेड़ के उखड़ने से
वह एक बार उखड़ता है
पर उससे जुड़ा आदमी
दो बार उखड़ता है
एक बार अपनी ज़मीन से उखड़ता है
और दूसरी बार अपनों की
स्मृतियों के स्पर्श से उजड़ता है।

- जसिंता केरकेट्टा
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डॉ० नीरू भट्ट के सौजन्य से 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

शहर और गाय

मैं नहीं जानता 
चरागाहों से शहर तक 
गायों की लंबी यात्रा के लिए 
किसने बनवाई सड़कें? 
कौन कर रहा ग़ायब 
पृथ्वी से उनके हिस्से की घास? 

मैं यह भी नहीं जानता 
किसने उड़ाई यह अफ़वाह 
कि शहर के पास 
घास उगा लेने की ताक़त है। 

घासों की तलाश में 
पूरे कुनबे के साथ 
वे निकल पड़ीं 
उस रास्ते पर 
जो जाता था 
शहर की ओर। 

वहाँ भूख की सींगों ने 
तोड़ दिया उनका सारा भ्रम, 
वे तलाशने लगीं 
अपने गाँव-घरों और चरागाहों के रास्ते, 
पर बंद थे सारे रास्ते 
ऊँची इमारतों से। 

सड़कों पर पड़ी उदास 
वे शामिल हो गईं 
बच्चों की टोलियों में, 
टोलियाँ जो भोर होते ही 
चुनने लगती हैं प्लास्टिक कचरे से। 

बच्चों के नन्हे हाथों के बीच 
कचरे के ढेर में फँसा है अब 
उनका मुँह भी। 

सड़क पर बेतहाशा भटकती हुए 
उन्होंने पहली बार देखा 
शहर में इंसान टाँग रहे हैं 
इंसानों को पेड़ पर 
और पहली बार जाना 
शहर के पास 
घास उगाने की कोई ताक़त नहीं। 

सिहर उठी गायें धड़ाम से 
बैठ गईं सड़क पर 
और तब से बैठी हैं 
शहर के बीचों-बीच 
किसी धरने की तरह, 
यह माँगते हुए कि 
वे लौट जाना चाहती हैं 
अपनी घास के पास, 
कि वे जाना चाहती हैं 
जीवित चरागाहों तक 
जो अब भी कहीं उनके इंतज़ार में हैं, 
कि वे गुम हो जाना चाहती हैं 
उन जंगलों में 
जहाँ पेड़ और पत्ते तो बहुत होंगे 
पर आदमी को न आती होगी 
किसी आदमी को 
पेड़ पर टाँगने की कला। 

- जसिंता केरकेट्टा।
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संपादकीय चयन