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बुधवार, 7 अगस्त 2024

देह का रास्ता

तुम आते रहे हमेशा मेरे द्वार
अलग-अलग स्वांग रचाकर
कभी सूरज, कभी चंदा,
कभी विष्णु, कभी शिव
कभी राम, कभी कृष्ण
कभी याज्ञवल्क्य, तो कभी गौतम
तुम्हारे लिए मैं कभी अदिति बनी, कभी रोहिणी
कभी लक्ष्मी बनी, कभी पार्वती
कभी सीता बनी तो कभी राधा
कभी गार्गी, कभी अहिल्या 
और मुझे जबाला बनाना तो सबसे आसान रहा तुम्हारे लिए
हर युग में तुमने मुझे तदर्थ ही लिया
और मैं निभाती रही संविदा कि तरह
तुम्हारे नियमों को
आदि पुरूष ने देह का रास्ता दिखाया था
और तुम अटके हुए हो अभी भी वहीं पर
लेकिन मुझे किसी भी शब्दकोश में
पुरूष या स्त्री का अर्थ
देह नहीं मिला
मैं भरोसा करती हूँ
शब्दकोशों पर!

- अलकनंदा साने
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

शनिवार, 3 अगस्त 2024

आदमी

मैं चींटी से डरती हूँ, कहीं काट न ले
मैं तिलचट्टे से डरती हूँ, कहीं घर पर कब्ज़ा न कर ले
मैं छिपकली से डरती हूँ कहीं ...
मैं चूहे से डरती हूँ ...
मैं बिल्ली से डरती हूँ ...
मैं कुत्ते से, सूअर से
केंचुए से, साँप से
सबसे डरती हूँ
मैं सबसे ज़्यादा तुमसे डरती हूँ
पता चला है कि तुम आदमी हो
और भी बहुत कुछ सुना है तुम्हारे बारे में!

- अलकनंदा साने
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से 

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

संदेह का लाभ

यूँ तो अपराधी कई थे,
पर हमेशा और बड़ी तादाद में
चींटियाँ ही मारी गईं
वे रात के अँधेरे में चुपचाप
करते थे हमला
चींटियाँ घूमती थी
दिन के उजाले में
झुंड की झुंड बेख़ौफ़
अपराध करते हुए देखी गईं चींटियाँ
और सजा उन्हें ही मिली
बाकी निर्दोष छूट गए
संदेह का लाभ लेकर...!

- अलकनंदा साने
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से