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मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं
 
धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से
मुहब्बत से ही खुश्बू, फूल, सूरज, चाँद होते हैं
 
करें परवाह क्या वो मौसमों के रुख़ बदलने की
परिंदे जो यहाँ परवाज़ पर तूफ़ान ढोते हैं
 
अजब से कुछ भुलैयों के बने हैं रास्ते उनके
पलट के फिर कहाँ आए, जो इन गलियों में खोते हैं
 
जगी हैं रात भर पलकें, ठहर ऐ सुब्‍ह थोड़ा तो
मेरी इन जागी पलकों में अभी कुछ ख़्वाब सोते हैं
 
मिली धरती को सूरज की तपिश से ये खरोंचे जो
सितारे रात में आकर उन्हें शबनम से धोते हैं
 
लकीरें अपने हाथों की बनाना हमको आता है
वो कोई और होंगे अपनी क़िस्मत पे जो रोते हैं

- गौतम राजऋषि।
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रविवार, 14 जनवरी 2024

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो 
जो बीतती काँटों पे है, वो टहनियों से पूछ लो

लिखती हैं क्या क़िस्से कलाई की खनकती चूड़ियाँ
जो सरहदों पर जाती हैं, उन चिट्ठियों से पूछ लो

होती है गहरी नींद क्या, क्या रस है अब के आम में
छुट्टी में घर आई हरी इन वर्दियों से पूछ लो

जो सुन सको क़िस्सा थके इस शहर के हर दर्द का
सड़कों पे फैली रात की ख़ामोशियों से पूछ लो

लौटा नहीं है काम से बेटा, तो माँ के हाल को
खिड़की से रह-रह झाँकती बेचैनियों से पूछ लो

गहरी गईं कितनी जड़ें तब जाके क़द ऊँचा हुआ
आकाश छूने की कहानी फुनगियों से पूछ लो

होती हैं इनकी बेटियाँ कैसे बड़ी रह कर परे
दिन-रात इन मुस्तैद सीमा-प्रहरियों से पूछ लो

लब सी लिए सबने यहाँ, सच जानना है गर तुम्‍हें
ख़ामोश आँखों में दबी चिंगारियों से पूछ लो

- गौतम राजऋषि।
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संपादकीय चयन 

बुधवार, 10 जनवरी 2024

ढीठ सूरज बादलों को मुँह चिढ़ाने के लिए

ढ़ीठ सूरज बादलों को मुँह चिढ़ाने के लिए 
चल पड़ा है, देख, बारिश में नहाने के लिए 

कुछ सहमती, कुछ झिझकती, गुनगुनाती पौ फटी
सोये जग को भैरवी की धुन सुनाने के लिए 

घोंसले में अपने गौरेया है बैठी सोचती
जाए वो किस बाग़ में अमरूद खाने के लिए 

पर्वतों पर बर्फ़ के फाहे ठिठुरने जब लगे
चुपके-से घाटी में फिसले खिलखिलाने के लिए 

बेहया-सी दोपहर ठिठकी हुई है अब तलक
और ज़िद्दी शाम है बेचैन आने के लिए 

नकचढ़ी इक दूब दिन भर धूप में ऐंठी रही
रात उतरी शबनमी उसको रिझाने के लिए 

चाँद को टेढ़ा किए मुँह देखकर तारे सभी
आ गये ठुड्ढ़ी उठाए टिमटिमाने के लिए

- गौतम राजऋषि।
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संपादकीय चयन