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शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

विदा

तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे

जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार।

तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में।

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।

तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे।

- अशोक वाजपेयी।
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विजया सती की पसंद 

शनिवार, 6 जनवरी 2024

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा धूप में चिड़ियों का स्पंदन है,
हरी पत्तियों का नीरव उजला गान है,

प्रतीक्षा
दरवाज़े पर दस्तक के अनसुने रहने पर
छोड़े गए शब्द हैं -

- अशोक वाजपेयी।
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बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

मुझे चाहिए

मुझे चाहिए पूरी पृथ्वी
अपनी वनस्पतियों, समुद्रों
और लोगों से घिरी हुई,
एक छोटा-सा घर काफ़ी नहीं है।

एक खिड़की से मेरा काम नहीं चलेगा,
मुझे चाहिए पूरा का पूरा आकाश
अपने असंख्य नक्षत्रों और ग्रहों से भरा हुआ।

इस ज़रा सी लालटेन से नहीं मिटेगा
मेरा अंधेरा,
मुझे चाहिए
एक धधकता हुआ ज्वलंत सूर्य।

थोड़े से शब्दों से नहीं बना सकता
मैं कविता,
मुझे चाहिए समूची भाषा –
सारी हरीतिमा पृथ्वी की
सारी नीलिमा आकाश की
सारी लालिमा सूर्योदय की।

- अशोक वाजपेयी।
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संपादकीय पसंद 

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023

आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न

वृक्षएकशरीरहै

पृथ्वीकेशरीरसेउगताहुआऔरअटूट

फूलतभीतकफूलहैजबतकवहएकअंगहैवृक्षका

औरपत्तियाँतभीतकपत्तियाँजबतकवेवृक्षसेहीलगीहैं

जबतकतुमसाधेहोउसकेशरीरको

तभीतक

उसकीआत्माभीतुमसेअटूटहै

आत्माशरीरकाअनंतस्वप्नदेखतीहै।


- अशोक वाजपेयी।

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संपादकीय पसंद