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सोमवार, 15 जुलाई 2024

संगीत

सारंगी इसलिए बनी थी
कि प्रकृति किसी कंधे की टेक ले
सुना सके
पीड़ा की तान पर
प्रेमियों के बिछोह के गीत

तबला बना
इसलिए कि वो बाँध सके
उन तानों को
अंतहीन आवर्तनों के अहाते में
जो आते-जाते उन गीतों के आघातों से
बस!
टूटने टूटने को होते
कि तभी
तुम थाम लेती हो  
उन गिरते अहातों को
कंठ से फूटे
एक कसे हुए आलाप में

ईश्वर ने पृथ्वी पर प्रेम रखा
और उसके अंजाम पर ठिठक गया खुद
तुम आई
कि उस घबराए हुए ईश्वर
को चाहिए थी तुम्हारी तान की टेक
अपने शोक गीतों के लिए 
चाहिए था
एक स्त्री के हृदय भर का आसमान

- जया पाठक श्रीनिवासन
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अनूप भार्गव की पसंद 

रविवार, 9 जून 2024

बेशर्म आज़ाद आवारा औरतें

बेशर्म आज़ाद आवारा औरतें
चुनती हैं सबसे शोख रंग की लिपस्टिक
नहीं डरती अपने ही कूल्हों के मटकने से
दुपट्टों को फैशन एक्सेसरीज-सा ओढ़ती हैं
खुद तय करती हैं अपने सौंदर्य के मानक
देखती हैं खुद को आईने में देखते हुए
 
बेशर्म आज़ाद आवारा औरतें
रोटियाँ बेल झट बच्चों के टिफ़िन पैक कर
निकल पड़ती हैं अपने उद्देश्य की ओर
जैसे पृथ्वी पर खेंचे सभी रास्ते
उसके अपने श्रम का मेहनताना हों
 
बेशर्म आज़ाद आवारा औरतें
प्रेम करती हैं - खुलकर
सपने देखती हैं - वैयक्तिक
हँसती हैं - ठठाकर
पढ़ती हैं - खबरें
प्रश्न उठाती हैं मुद्दों पर
 
बेशर्म आज़ाद आवारा औरतें
सहलाती हैं पृथ्वी को
जैसे वो उनकी बूढी माँ हो
देखती हैं आसमान की आँखों में
इतिहास की कराह
और जीती हैं इस तरह
मानो ये दुनिया उनकी अपनी हो!
 
-  जया पाठक श्रीनिवासन
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से

गुरुवार, 6 जून 2024

परसाई से सुना था

(१)
वह लंबी लंबी डींगें हाँकता था
अक्सर सब
सुनते थे उसकी बात
उसकी बातों में उन सबके मन का
भेड़िया झाँकता था
अक्सर जब वो बोलता था
सब भेड़ बनकर
बैठ जाते थे, सुनने
मैंने देखा -
कई बार बोलते हुए
उसके मुँह से लार टपकती थी
 
(२)
सभी भेड़ों के सीने में एक कील चुभी हुई थी
भेड़िया बोलता रहा
कीलों को गड़ाता,
चुभन बढ़ाता हुआ
सहसा, ग़दर-सा मचा
भेड़ों की भीड़ एक भेड़ पर ही झपट पड़ी
वह भेड़,
जो चैन से सो रही थी -
कील निकाल
कर,
मार डाली गई 
भेड़िया मुस्कुराता रहा देर तक

- जया पाठक श्रीनिवासन
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हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से