जहाँ सुख है
वहीं हम चटककर
टूट जाते हैं बारंबार
जहाँ दुख है
वहाँ पर एक सुलगन
पिघलाकर हमें
फिर जोड़ देती है।
- अज्ञेय
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छोटे,किंतुद्वित्वमेंइतनेसुंदर,जग-हियईर्ष्यासेभरजावे;
भरक्यों- भरासदारहताहै- छल-छलउमड़ाआवे!
— सलग,प्रणयकीआँधीमेंमानोलेदिन-मान,
विधिकाकरते-सेआह्वान।
मैंजोरहादेखता,तबविधिनेभीसबकुछदेखाहोगा-
वहविधि,जिसकेअधिकृतउनकेमिलन-विरहकालेखाहोगा-
किंतुरहेवेफिरभीसटेहुए,संलग्न-
आत्मतामेंहीतन्मय,तन्मयतामेंसततनिमग्न!
और—बीतचुकाजबमेरेजानेसमययुगोंका—
आयाएकहवाकाझोंका—काँपेतार—झरादोकणनीहार—
उससमयभीतोउनकेउरकेभीतर
कोईख़लिशनहींथी—कोईरिक्तनहींथा—
नहींवेदनाकीटीसोंकोस्थानकहींथा!
तबभीतोवेसहजपरस्परपंखसेपंखमिलाए
वाताहततमकीझगझोरमेंभीअपनेचारोंओर
एकप्रणयकानिश्चलवातावरणजमाए
उड़ेजारहेथे,अतिशयनिर्द्वंद्व—
औरविधिदेखरही—नि:स्पंद!
लौटचलाआयाहूँ,फिरभीप्राणपूछतेजातेहैं
क्यावहसचथा!औरनहींउत्तरपातेहैं—
औरकहेहीजातेहैं
किआजमैं
अचरजएकदेखआया।
- अज्ञेय।
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