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रविवार, 13 जुलाई 2025

जहाँ सुख है

जहाँ सुख है
वहीं हम चटककर
टूट जाते हैं बारंबार 

जहाँ दुख है
वहाँ पर एक सुलगन
पिघलाकर हमें
फिर जोड़ देती है।

- अज्ञेय
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सोमवार, 2 दिसंबर 2024

मैंने आहुति बन कर देखा

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?

पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने-
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने!

अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है-
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है

मैंने विदग्ध हो जान लिया, अंतिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!
मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ
कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ

मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!
भव सारा तुझ पर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने-
तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने

- अज्ञेय
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कविता कोश से साभार 

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 
बह गया जग मुग्ध सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

तुम विमुख हो, किंतु मैंने कब कहा उन्मुख रहो तुम? 
साधना है सहसनयना—बस, कहीं सम्मुख रहो तुम! 
विमुख-उन्मुख से परे भी तत्त्व की तल्लीनता है
लीन हूँ मैं, तत्त्वमय हूँ अचिर चिर-निर्वाण में हूँ! 
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

क्यों डरूँ मैं मृत्यु से या क्षुद्रता के शाप से भी? 
क्यों डरूँ मैं क्षीण-पुण्या अवनि के संताप से भी? 
व्यर्थ जिसको मापने में हैं विधाता की भुजाएँ
वह पुरुष मैं, मर्त्य हूँ पर अमरता के मान में हूँ! 
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

रात आती है मुझे क्या? मैं नयन मूँदे हुए हूँ, 
आज अपने हृदय में मैं अंशुमाली को लिए हूँ! 
दर के उस शून्य नभ में सजल तारे छलछलाए
वज्र हूँ मैं, ज्वलित हूँ, बेरोक हूँ, प्रस्थान में हूँ! 
में तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

मूक संसृति आज है, पर गूँजते हैं कान मेरे, 
बुझ गया आलोक जग में, धधकते हैं प्राण मेरे। 
मौन या एकांत या विच्छेद क्यों मुझको सताए? 
विश्व झंकृत हो उठे, मैं प्यार के उस गान में हूँ! 
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

जगत है सापेक्ष, या है कलुष तो सौंदर्य भी है, 
हैं जटिलताएँ अनेक, अंत में सौकर्य भी है। 
किंतु क्यों विचलित करे मुझको निरंतर की कमी यह
एक है अद्वैत जिस स्थल मैं उस स्थान में हूँ! 
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

वेदना अस्तित्व की, अवसान की दुर्भावनाएँ
भव-मरण, उत्थान-अवनति, दुख-सुख की प्रक्रियाएँ 
आज सब संघर्ष मेरे पा गए सहसा समन्वय
आज अनिमिष देख तुमको लीन मैं चिर-ध्यान में हूँ! 
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 

बह गया जग मुग्ध-सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ! 
प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

- अज्ञेय
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हरप्रीत सिंह पुरी की पसंद 

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

छंद

मैं सभी ओर से खुला हूँ 
वन-सा, वन-सा अपने में बंद हूँ 
शब्द में मेरी समाई नहीं होगी 
मैं सन्नाटे का छंद हूँ।

- अज्ञेय
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संपादकीय चयन 

बुधवार, 8 मई 2024

मेरे देश की आँखें

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठाई हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें -
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं...
 
तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ -
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं...
 
वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें,
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें...
 
उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सुकचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं -
और कितने काल-सागरों के पार तैर आयीं
मेरे देश की आँखें...

- अज्ञेय।
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संपादकीय चयन 

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

नया कवि - आत्म स्वीकार

किसी का सत्य था,
मैंने संदर्भ से जोड़ दिया।
कोई मधु-कोष काट लाया था,
मैंने निचोड़ लिया।
किसी की उक्ति में गरिमा थी,
मैंने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया
किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था
मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया।
कोई हुनरमंद था -
मैंने देखा और कहा, 'यों!'
थका भारवाही पाया -
घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों?'
किसी की पौध थी,
मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली,
किसी की लगाई लता थी,
मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली
किसी की कली थी :
मैंने अनदेखे में बीन ली,
किसी की बात थी।
मैंने मुँह से छीन ली।
यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ -
काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ?
चाहता हूँ आप मुझे
एक-एक शब्द सराहते हुए पढ़ें।
पर प्रतिमा- अरे वह तो
जैसी आपको रुचे आप स्वयं गढ़ें।

- अज्ञेय।
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संपादकीय चयन 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2023

अचरज

आजसवेरे
अचरजएकदेखमैंआया।

एकघने,परधूल-भरे-सेअर्जुनतरुकेनीचे

एकतारपरबिजलीकेवेसटेहुएबैठेथे -
दोपक्षीछोटे-छोटे,

घनीछाँहमें,जगसेअलग;किंतुपरस्परसलग।

औरनयनशायदअधमीचे।

औरउषाकीधुँधली-सीअरुणालीथीसाराजगसींचे।

छोटे,इतनेक्षुद्र,किजगकीसदासजगआँखोंकीएकअकेलीझपकी -
एकपलमेंवेमिटजाएँ,कहींपाएँ -

छोटे,किंतुद्वित्वमेंइतनेसुंदर,जग-हियईर्ष्यासेभरजावे;

भरक्यों- भरासदारहताहै- छल-छलउमड़ाआवे!

— सलग,प्रणयकीआँधीमेंमानोलेदिन-मान,

विधिकाकरते-सेआह्वान।

मैंजोरहादेखता,तबविधिनेभीसबकुछदेखाहोगा-

वहविधि,जिसकेअधिकृतउनकेमिलन-विरहकालेखाहोगा-

किंतुरहेवेफिरभीसटेहुए,संलग्न-

आत्मतामेंहीतन्मय,तन्मयतामेंसततनिमग्न!

और—बीतचुकाजबमेरेजानेसमययुगोंका—

आयाएकहवाकाझोंका—काँपेतार—झरादोकणनीहार—

उससमयभीतोउनकेउरकेभीतर

कोईख़लिशनहींथी—कोईरिक्तनहींथा—

नहींवेदनाकीटीसोंकोस्थानकहींथा!

तबभीतोवेसहजपरस्परपंखसेपंखमिलाए

वाताहततमकीझगझोरमेंभीअपनेचारोंओर

एकप्रणयकानिश्चलवातावरणजमाए

उड़ेजारहेथे,अतिशयनिर्द्वंद्व—

औरविधिदेखरही—नि:स्पंद!

लौटचलाआयाहूँ,फिरभीप्राणपूछतेजातेहैं

क्यावहसचथा!औरनहींउत्तरपातेहैं—

औरकहेहीजातेहैं

किआजमैं

अचरजएकदेखआया।


- अज्ञेय।

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संपादकीय पसंद