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सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल

हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे

थीं सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे

ख़ुदकुशी क्या दुखों का हल बनती
मौत के अपने सौ झमेले थे

ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं
उन दिनों हमने फ़ाके झेले थे।

- जावेद अख़्तर।
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बिनीता सहाय की पसंद 

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

ग़ज़ल

सौमेंसत्तरआदमीफ़िलहालजबनाशादहैं

दिलरखकरहाथकहिएदेशक्याआज़ादहै


कोठियोंसेमुल्ककेमेआरकोमतआँकिए
असलीहिंदुस्तानतोफुटपाथपरआबादहै

जिसशहरमेंमुंतज़िमअंधेहोंजल्वागाहके
उसशहरमेंरौशनीकीबातबेबुनियादहै

येनईपीढ़ीपेनिर्भरहैवहीजजमेंटदे
फ़लसफ़ागाँधीकामौजूँहैकिनक्सलवादहै

यहग़ज़लमरहूममंटोकीनज़रहैदोस्तों
जिसकेअफ़सानेमेंठंडेगोश्तकीरूदादहै

- अदम गोंडवी।
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संपादकीय पसंद

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

ग़ज़ल

ज़रा मोहतात होना चाहिए था 
बग़ैर अश्कों के रोना चाहिए था

अब उनको याद करके रो रहे हैं 
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिए था

मिरी वादा-ख़िलाफ़ी पर वो चुप है 
उसे नाराज़ होना चाहिए था 

चला आता यक़ीनन ख़्वाब में वो 
हमें कल रात सोना चाहिए था 

सुई धागा मोहब्बत ने दिया था 
तो कुछ सीना पिरोना चाहिए था 

हमारा हाल तुम भी पूछते हो 
तुम्हें मालूम होना चाहिए था 

वफ़ा मजबूर तुमको कर रही थी 
तो फिर मजबूर होना चाहिए था 

- फ़हमी बदायूनी।
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मोहतात - सतर्क, सावधान।
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अनूप भार्गव की पसंद