रविवार, 13 जुलाई 2025
जहाँ सुख है
जहाँ सुख है
वहीं हम चटककर
टूट जाते हैं बारंबार
जहाँ दुख है
वहाँ पर एक सुलगन
पिघलाकर हमें
फिर जोड़ देती है।
- अज्ञेय
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1 टिप्पणी:
Veena Vij
14 जुलाई 2025 को 11:42 pm बजे
अज्ञेय मेरे प्रिय कवि हैं। दो विपरीत भावों को एक ही कविता में पिरो दिया है। अति सुंदर!
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अज्ञेय मेरे प्रिय कवि हैं। दो विपरीत भावों को एक ही कविता में पिरो दिया है। अति सुंदर!
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