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बुधवार, 28 मई 2025

आसमान के पार स्वर्ग है

आसमान के पार स्वर्ग है
सोच गया घर से
जाकर देखा 
वहाँ अँधेरा दीपक को तरसे
जीवन का पौधा उगता 
हिमरेखा के नीचे 
धार प्रेम की 
जहाँ नदी बन धरती को सींचे
आसमान से आम आदमी लगता है चींटी
नभ केवल रंगीन भरम है
सच्चाई मिट्टी
गिर जाता जो अंबर से 
वो मरता है
डर से
अंबर तक यदि जाना है तो 
चिड़िया बन जाओ
दिन भर नभ की सैर करो 
पर संध्या घर आओ
आसमान पर कहाँ बसा है
कभी किसी का घर
ज्यादा जोर लगाया जिसने
टूटे उसके पर
फैलो 
काम नहीं चलता ऊँचा उठने भर से

-'सज्जन' धर्मेन्द्र

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- हरप्रीत सिंह पुरी के सौजन्य से