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मंगलवार, 2 सितंबर 2025

बहनें

जब बाप गरज रहे होते हैं 
बाप जैसे 

माँ रो रही होती है 
माँ जैसी 

भाई खड़े रहते हैं 
भाई जैसे 

तब 
कुछ भाई
कुछ माँ 
कुछ बाप जैसी 
प्रार्थना में 
झुकी रहती हैं 
बहनें 

- विनोद कुमार श्रीवास्तव 
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विजया सती की पसंद 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

बहनें

आँगन में बंधे खंभे से
लट-सी उलझ जाती हैं बहनें
और दर्द की एक सदी
खुली छत की गर्म हवा में
कबूतर बन उड़ जाती है।

वे बाप की छप्पन साल पुरानी कमीज़ हैं
वे माँ के बचपन की यादें हैं
जो
उठती हैं हर शाम
चूल्हे के धूएँ संग
और
उड़तीं हैं पतंग बन।

वे चुनती हैं
प्याली भर चावल
कि
ज़िंदगी को बनाया जा सके
अधिक से अधिक
साफ़ और सफ़ेद।

वे बनती हैं
आँगन से गली
और
गली से मैदान
जहाँ
रात की चादर में
बुलबुले सी फूटती है भोर
और
देखते ही देखते
धरती की माँ बन जाती हैं
बहनें।

- तुषार धवल
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संपादकीय चयन